पाठ 4: कृषि (Agriculture)
भारत एक कृषि प्रधान देश है — यहाँ अधिकांश लोग अपनी आजीविका के लिए खेती पर निर्भर हैं। कृषि न केवल भोजन उपलब्ध कराती है,
बल्कि उद्योगों के लिए कच्चा माल भी देती है और देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है।
कृषि के प्रमुख प्रकार :
- आत्मनिर्भर (Subsistence) कृषि: किसान अपनी जरूरत के लिए खेती करता है।
- व्यावसायिक (Commercial) कृषि: बाजार में बेचने के लिए बड़े पैमाने पर खेती।
- मिश्रित (Mixed) कृषि: फसल और पशुपालन दोनों साथ में।
- झूम या स्थानांतरित कृषि: पारंपरिक पद्धति जिसमें भूमि को बदल-बदल कर खेती की जाती है।
भारत में कृषि मुख्यतः मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है। इसलिए सिंचाई, जल संरक्षण और आधुनिक तकनीकें
खेती को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि (Primitive Subsistence Farming)
प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि भारत की सबसे पुरानी कृषि प्रणाली मानी जाती है।
इस प्रकार की खेती में किसान अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ही फसल उगाता है,
न कि बाजार में बेचने के लिए।
मुख्य विशेषताएँ :
- छोटे भू-भाग पर पारंपरिक औज़ारों और पशु शक्ति से खेती की जाती है।
- सिंचाई के स्थान पर वर्षा पर निर्भरता रहती है।
- उत्पादन बहुत सीमित होता है — केवल परिवार की खपत के लिए।
- यह मुख्यतः पहाड़ी, वन या आदिवासी क्षेत्रों में पाई जाती है।
इस प्रकार की खेती को झूम खेती (Jhum cultivation) कहा जाता है।
इसमें भूमि का एक टुकड़ा साफ करके कुछ वर्ष खेती की जाती है, फिर उसे छोड़कर नई भूमि पर खेती शुरू की जाती है।
झूम कृषि (Jhum Cultivation)
झूम कृषि को स्थानांतरित कृषि या Shifting Cultivation भी कहा जाता है।
यह प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि का एक रूप है, जो मुख्यतः भारत के
पूर्वोत्तर राज्यों और वनों से आच्छादित पहाड़ी क्षेत्रों में की जाती है।
मुख्य विशेषताएँ :
- किसान जंगल का एक छोटा भाग काटकर और जलाकर खेती योग्य बनाते हैं।
- भूमि पर कुछ वर्षों तक फसल उगाने के बाद उसे छोड़कर नई भूमि पर खेती की जाती है।
- सिंचाई के बजाय वर्षा पर निर्भरता होती है।
- औज़ार पारंपरिक होते हैं और उत्पादन परिवार की खपत के लिए ही होता है।
स्थान और नाम :
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में झूम कृषि को अलग-अलग नामों से जाना जाता है —
- मिज़ोरम, नागालैंड, मेघालय में — झूम (Jhum)
- मध्य भारत में — बीवर या दाही
- ओडिशा में — पोडू या पेंडा
- आंध्र प्रदेश में — पोडू या कोनाबा
यह कृषि पर्यावरण पर प्रभाव डालती है क्योंकि भूमि जलाने से मिट्टी की उर्वरता कम होती है
और वनों की कटाई बढ़ती है। आज सरकारें किसानों को स्थायी खेती के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं।
गहन जीविका कृषि (Intensive Subsistence Farming)
गहन जीविका कृषि वह कृषि पद्धति है जिसमें सीमित भूमि पर अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने के लिए किसान अत्यधिक श्रम, खाद, और सिंचाई साधनों का प्रयोग करते हैं। यह कृषि मुख्यतः जनसंख्या-घनत्व वाले क्षेत्रों में की जाती है जहाँ प्रति व्यक्ति भूमि बहुत कम होती है। किसान अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इस पद्धति का उपयोग करते हैं।
मुख्य विशेषताएँ :
- भूमि का गहन उपयोग किया जाता है — वर्ष में दो या तीन बार फसल उगाई जाती है।
- अधिक श्रम, पशु शक्ति और जैविक खादों का प्रयोग होता है।
- आधुनिक तकनीक का प्रयोग सीमित मात्रा में किया जाता है।
- यह कृषि वर्षा और सिंचाई दोनों पर निर्भर करती है।
- कृषक का उद्देश्य स्वयं के परिवार की आवश्यकताएँ पूरी करना होता है, न कि बाजार के लिए उत्पादन।
मुख्य फसलें :
धान, गेहूँ, मक्का, दलहन, सब्जियाँ और तिलहन इस कृषि में प्रमुख रूप से उगाई जाती हैं।
भारत में उदाहरण :
- उत्तर प्रदेश – धान और गेहूँ की दोहरी फसल प्रणाली।
- बिहार – भूमि के छोटे टुकड़ों पर गहन धान और दलहन उत्पादन।
- पश्चिम बंगाल – धान, आलू और सब्जियों की बहु-फसली खेती।
- केरल – धान और नारियल की मिश्रित गहन कृषि।
रोचक तथ्य :
भारत और चीन जैसे देशों में लगभग 70% कृषक गहन जीविका कृषि में संलग्न हैं, जहाँ भूमि सीमित लेकिन श्रम बल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।
शस्य प्रारूप (Crop Pattern)
किसी क्षेत्र में उगाई जाने वाली फसलों की विविधता और उनका अनुक्रम शस्य प्रारूप या फसल पैटर्न कहलाता है। यह बताता है कि किसी भूमि पर कौन-सी फसलें, किस ऋतु में और किस क्रम में उगाई जाती हैं। यह प्रारूप जलवायु, मिट्टी, सिंचाई, तकनीक और बाजार की माँग पर निर्भर करता है।
शस्य प्रारूप को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक :
- जलवायु एवं वर्षा की मात्रा
- मिट्टी का प्रकार और उपजाऊपन
- सिंचाई के साधन और उपलब्धता
- तकनीकी विकास एवं कृषि यंत्र
- बाजार की माँग और सरकारी नीतियाँ
मुख्य फसल ऋतुएँ :
- खरीफ फसलें (Kharif Crops): वर्षा ऋतु में बोई जाती हैं (जून–सितंबर)। प्रमुख फसलें – धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, मूँगफली।
- रबी फसलें (Rabi Crops): शीत ऋतु में बोई जाती हैं (अक्टूबर–मार्च)। प्रमुख फसलें – गेहूँ, जौ, चना, सरसों।
- जायद फसलें (Zaid Crops): गर्मी के महीनों में बोई जाती हैं (मार्च–जून)। प्रमुख फसलें – तरबूज, खरबूज, ककड़ी, सब्जियाँ।
भारत में प्रमुख शस्य प्रारूप :
- उत्तर भारत: गेहूँ–धान का क्रम प्रमुख है।
- पश्चिम भारत: कपास–गेहूँ और बाजरा–चना।
- दक्षिण भारत: धान–नारियल–गन्ना।
- पूर्वी भारत: धान–आलू–दलहन।
रोचक तथ्य :
भारत में फसल विविधता का मुख्य उद्देश्य भूमि की उर्वरता बनाए रखना, कीट नियंत्रण और अधिक आय प्राप्त करना होता है।
मुख्य फसलें (Major Crops of India)
मिट्टी, जलवायु और कृषि पद्धतियों में विविधता के कारण भारत के विभिन्न भागों में अनेक प्रकार की खाद्य एवं अखाद्य फसलें उगाई जाती हैं। भारत को विविध फसलों का देश कहा जाता है क्योंकि यहाँ के प्रत्येक क्षेत्र में पर्यावरणीय स्थितियों के अनुसार फसलों की विशेषता पाई जाती है।
भारत की प्रमुख फसलें :
- चावल (Rice): भारत की मुख्य खाद्य फसल है। इसे गर्म और आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है। प्रमुख उत्पादक राज्य – पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, असम, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु।
- गेहूँ (Wheat): शीत ऋतु की प्रमुख फसल है। इसे ठंडी जलवायु और उपजाऊ दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है। प्रमुख उत्पादक राज्य – उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश।
- मोटे अनाज (Coarse Cereals): ज्वार, बाजरा और मक्का को शामिल किया जाता है। ये कम वर्षा वाले क्षेत्रों में उगाई जाती हैं। प्रमुख राज्य – राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश।
- दालें (Pulses): प्रोटीन का मुख्य स्रोत हैं। चना, मसूर, अरहर, मूँग, उड़द प्रमुख दालें हैं। मुख्य राज्य – मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान।
- चाय (Tea): ढलान वाले और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में उगाई जाती है। प्रमुख क्षेत्र – असम, पश्चिम बंगाल (दार्जिलिंग), तमिलनाडु और केरल।
- कॉफी (Coffee): दक्षिण भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में उगाई जाती है। प्रमुख राज्य – कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु।
- गन्ना (Sugarcane): यह उष्णकटिबंधीय जलवायु की फसल है। प्रमुख राज्य – उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब और हरियाणा।
- तिलहन (Oilseeds): सरसों, मूँगफली, तिल, सूरजमुखी, सोयाबीन प्रमुख हैं। प्रमुख राज्य – गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र।
- कपास (Cotton): गर्म और शुष्क जलवायु की फसल है। प्रमुख राज्य – महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, पंजाब।
- जूट (Jute): आर्द्र एवं गर्म जलवायु की फसल है। प्रमुख राज्य – पश्चिम बंगाल, असम, बिहार और ओडिशा।

रोचक तथ्य :
भारत विश्व में चाय, दाल और गन्ने का एक प्रमुख उत्पादक देश है। यहाँ के किसान जलवायु और मिट्टी के अनुसार फसलों का चयन करते हैं जिससे कृषि में विविधता बनी रहती है।
खाद्यान्नों के अतिरिक्त फसलें
भारत में खाद्यान्नों के अतिरिक्त अनेक आर्थिक (cash/industrial) फसलें उगाई जाती हैं — जैसे गन्ना, चाय, कॉफ़ी, कपास, रबड़ और जूट। ये फसलें घरेलू उद्योगों, निर्यात और ग्रामीण आर्थिकता के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। नीचे प्रत्येक फसल के बारे में संक्षेप में लेकिन विस्तार से जानकारी दी गई है।
1. गन्ना (Sugarcane)
जलवायु व मिट्टी: उष्णकटिबन्धीय से उपउष्णकटिबन्धीय जलवायु; अधिक पानी और नमी पसंद करता है। उपजाऊ दोमट और गहरी मिट्टी सर्वोत्तम।
मुख्य उत्पादन क्षेत्र (भारत): उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है।
फसल चक्र: लंबा चक्र — 10–18 महीने तक; कटाई-गुड़/चीनी उत्पादन के लिए।
प्रोसेसिंग और उपयोग: गन्ने का रस निकालकर चीनी (सुक्रोज), गुड़, मोलासेस, और बायोगैस तथा अन्य बायो-उत्पाद बनाए जाते हैं। बचा हुआ बगास (भट्टी में ईंधन या पेपर/बायोफ्यूल के लिए) उपयोगी है।
आर्थिक महत्व: चीनी उद्योग ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार देता है और चीनी-आधारित उद्योगों की कच्ची सामग्री।
चुनौतियाँ: पानी की अधिक मांग, मिट्टी की खनिज ह्रास, ब्लैक शुगर उद्योग की कीमतें और खेती का ऋण दबाव।
2. चाय (Tea)
जलवायु व मिट्टी: निरंतर आर्द्रता, हल्की ठंडी जलवायु (ढलान वाले क्षेत्र) व अम्लीय अच्छी नमीधारी मिट्टी को पसंद करती है।
मुख्य उत्पादन क्षेत्र (भारत): असम, पश्चिम बंगाल (दार्जिलिंग), तमिलनाडु (निलगिरी), केरल।
फसल चक्र व उत्पादन: चाय झाड़ियाँ बार-बार चिरनी (plucking) की जाती हैं — नव्या पत्तियों से चाय बनाई जाती है। प्रोसेसिंग में शैडोइंग, फर्मेंटेशन (कुछ प्रकार), सुखाने और रोलिंग शामिल है।
प्रकार और उपयोग: काली चाय, हरी चाय और ऊल आदि; घरेलू और निर्यात दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण।
आर्थिक महत्व: जम्मू-कृषि आधारित रोजगार, निर्यात आय और पेय उद्योग का आधार।
चुनौतियाँ: चाय बागानों की मजदूर समस्याएँ, जलवायु परिवर्तन से उपज का प्रभाव, गुणवत्तापूर्ण सुधार की लागत।
3. कॉफ़ी (Coffee)
जलवायु व मिट्टी: उष्ण-आर्द्र और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु; पहाड़ी क्षेत्रों में छाँव व अच्छी जल निकास वाली मिट्टी उत्तम।
मुख्य उत्पादन क्षेत्र (भारत): कर्नाटक (विशेषकर मन्नेहट्टा), केरल, तमिलनाडु, पूर्वोत्तर के कुछ हिस्से।
प्रकार: मुख्यतः अरेबिका और रोबस्टा। अरैबिका अच्छी गुणवत्ता की और ऊँचे स्थानों पर; रोबस्टा तिक्त व गर्म क्षेत्रों में।
प्रोसेसिंग व उपयोग: कच्ची बीन्स (चेरियाँ) की सुखाई, पेलेटिंग, रोस्टिंग व ग्राइंडिंग — कॉफ़ी पाउडर, इंस्टेंट कॉफ़ी और एक्सपोर्ट उत्पाद।
आर्थिक महत्व: उच्च-मूल्य फसल, निर्यात आधारित आय और गोल्डन-हैंडमिक बागान रोजगार।
चुनौतियाँ: बाजार की अस्थिर कीमतें, रोग (रस्ट आदि), और छाँव-आधारित खेती का प्रबंधन।
4. कपास (Cotton)
जलवायु व मिट्टी: गर्म व शुष्क से आंशिक नम क्षेत्रों में अच्छा होता है; गहरी दोमट व रेतीली दोमट मिट्टी उत्तम।
मुख्य उत्पादन क्षेत्र (भारत): महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश/तेलंगाना, पंजाब और हरियाणा के कुछ हिस्से।
उत्पादन व प्रोसेसिंग: कपास के बोन्स से रेशे निकाले जाते हैं; जूट/फाइबर जिंस जैसे कपड़ा उद्योग के लिए कच्चा माल। प्रोसेसिंग में जिन्निंग (seed separation), स्पिनिंग और टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग शामिल।
आर्थिक महत्व: टेक्सटाइल इंडस्ट्री का मुख्य कच्चा माल; कपड़ा निर्यात में बड़ा योगदान।
चुनौतियाँ: कीटों का हमला (बैलीवर्ड, मिरिड), बीज व इनपुट लागत, और पानी की आवश्यकता (कुछ किस्मों में)।
5. रबड़ (Natural Rubber)
जलवायु व मिट्टी: उष्णकटिबंधीय और आर्द्र जलवायु; उच्च वार्षिक वर्षा और समृद्ध जमीनी मिट्टी अनुकूल।
मुख्य उत्पादन क्षेत्र (भारत): केरल, तमिलनाडु, कोंकण, असम और पूर्वोत्तर के कुछ हिस्से।
उत्पादन व प्रोसेसिंग: टोपा (tapping) करके पेड़ से लेटेक्स निकाला जाता है; बाद में प्रोसेस कर रहती रबर (sheet/blocks) तैयार की जाती है।
उपयोग: टायर निर्माण, रबर-आधारित उत्पाद, औद्योगिक उपयोग।
चुनौतियाँ: रोग-प्रतिरोधकता, मौसम पर निर्भरता, और अंतरराष्ट्रीय कीमतें।
6. जूट (Jute)
जलवायु व मिट्टी: गर्म व आद्र जलवायु; प्लेनेटरी फसल — जलभराव वाले मैदानी व उपजाऊ मिट्टी अनुकूल।
मुख्य उत्पादन क्षेत्र (भारत): पश्चिम बंगाल (विशेष रूप से), असम, बिहार और ऊँचे गंगा-मैदानी क्षेत्र।
प्रोसेसिंग व उपयोग: जूट पौधे की छाल से रेशे निकाले जाते हैं (retting प्रक्रिया), जिनसे बैग, रस्सी, टेक्सटाइल और बायो-डिग्रेडेबल सामग्री बनती हैं।
आर्थिक महत्व: पारंपरिक बस्तों (जूट बैग) व निर्यात के लिए उपयोगी; सस्टेनेबल फैब्रिक के रूप में मांग बढ़ रही है।
चुनौतियाँ: पानी की आवश्यकता और retting के लिए उचित व्यवस्थाएँ, तथा सस्ता और अधिक टिकाऊ प्रतिस्पर्धी पदार्थ (जैसे प्लास्टिक)।
नोट:-
- ये फसलें राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और ग्रामीण रोजगार के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- हर फसल की जलवायु, मिट्टी और तकनीकी आवश्यकताएँ अलग होती हैं — इसलिए क्षेत्रीय उपयुक्तता अहम है।
- चुनौतियाँ — पानी की मांग, रोग, बाजार की अस्थिरता और पर्यावरणीय प्रभाव — नीतिगत समर्थन और सतत प्रथाओं से कम की जा सकती हैं।
प्रौद्योगिकीय और संस्थागत सुधार (Technological & Institutional Reforms)
भारत में कृषि क्षेत्र की उत्पादकता और किसानों की आय बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकीय और संस्थागत सुधार किए गए हैं। इन सुधारों का उद्देश्य आधुनिक तकनीक, बेहतर कृषि यंत्र और सामाजिक-आर्थिक नीतियों के माध्यम से खेती को अधिक लाभकारी, सतत और कुशल बनाना है।
प्रमुख प्रौद्योगिकीय सुधार:
- उन्नत बीज (High Yielding Varieties – HYV) का उपयोग।
- सिंचाई के आधुनिक साधन जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर इरिगेशन।
- कीट और रोग नियंत्रण के लिए आधुनिक कीटनाशक और जैविक उपाय।
- उर्वरक प्रबंधन और मिट्टी परीक्षण के माध्यम से पोषण संतुलन।
- कृषि यंत्र और मशीनरी का व्यापक उपयोग (जैसे ट्रैक्टर, हार्वेस्टर)।
प्रमुख संस्थागत सुधार:
- सिंचाई परियोजनाओं और जल संरक्षण के लिए सरकारी योजनाएँ।
- कृषक क्रेडिट और ऋण की सुविधा — कृषि बैंक, सहकारी बैंक।
- फसल बीमा योजनाएँ और जोखिम प्रबंधन।
- मंडी सुधार और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) प्रणाली।
- कृषक प्रशिक्षण, कृषि विस्तार सेवाएँ और तकनीकी जागरूकता।
इन सुधारों के माध्यम से किसानों की उपज में वृद्धि, लागत में कमी और आय में सुधार होता है। इसके अलावा सतत कृषि प्रथाओं को बढ़ावा मिलता है और जलवायु परिवर्तन तथा प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
भूदान और ग्रामदान आंदोलन
भारत में सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए भूदान और ग्रामदान आंदोलन की शुरुआत हुई। ये आंदोलन ज़मीन के पुनर्वितरण और ग्रामीण कल्याण के लिए महत्वपूर्ण रहे हैं। इनके माध्यम से असमान भूमि वितरण को कम करने और गरीब किसानों को भूमि देने का प्रयास किया गया।
भूदान आंदोलन:
- स्थापना: 1951 में स्वामी सत्यदेव जी और जवाहरलाल नेहरू के समर्थन से शुरू हुआ।
- उद्देश्य: बड़े ज़मींदारों से भूमि दान में लेकर गरीब किसानों को देना।
- प्रमुख योगदान: भूमि दान देने वाले किसानों और समाजसेवियों की भागीदारी।
- महत्व: सामाजिक न्याय, ग्रामीण गरीबों की आजीविका सुनिश्चित करना।
ग्रामदान आंदोलन:
- स्थापना: भूदान आंदोलन के विस्तार के रूप में।
- उद्देश्य: पूरे गाँव की भूमि दान में देकर सामूहिक कृषि और विकास को बढ़ावा देना।
- प्रमुख योगदान: गरीब किसानों और ग्रामीण समुदायों के कल्याण के लिए सामूहिक प्रयास।
- महत्व: ग्रामीण विकास, सामाजिक समरसता और भूमि सुधार को सशक्त बनाना।
इन आंदोलनों के माध्यम से भारत में ज़मीनी असमानताओं को कम करने और ग्रामीण गरीबों को आजीविका का अवसर देने में मदद मिली। यह आंदोलन आज भी भूमि सुधार और ग्रामीण विकास के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।
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अभ्यास प्रश्न: कृषि
1. बहुवैकल्पिक प्रश्न (Multiple Choice Questions)
(i) निम्नलिखित में से कौन-सा उस कृषि प्रणाली को दर्शाता है जिसमें एक ही फसल लंबे-चौड़े क्षेत्र में उगाई जाती है?
- क) स्थानांतरी कृषि
- ख) रोपण कृषि
- ग) बागवानी
- घ) गहन कृषि
उत्तर: क) स्थानांतरी कृषि
(ii) इनमें से कौन-सी रबी फसल है?
- क) चावल
- ख) मोटे अनाज
- ग) चना
- घ) कपास
उत्तर: ग) चना
(iii) इनमें से कौन-सी एक फलीदार फसल है?
- क) दालें
- ख) मोटे अनाज
- ग) ज्वार तिल
- घ) तिल
उत्तर: क) दालें
2. छोटे उत्तर वाले प्रश्न (लगभग 30 शब्द)
(i) एक पेय फसल का नाम और उपयुक्त भौगोलिक परिस्थितियाँ:
उत्तर: चाय: ढलान वाले पहाड़ी क्षेत्रों में, अधिक वर्षा, हल्की ठंडी जलवायु और अम्लीय अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में उपयुक्त। प्रमुख क्षेत्र – असम, दार्जिलिंग, केरल।
(ii) भारत की एक खाद्य फसल और उपयुक्त क्षेत्र:
उत्तर: धान: उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों में उगाया जाता है। प्रमुख राज्य – पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु।
(iii) सरकार द्वारा किसानों के हित में किए गए संस्थागत सुधार:
उत्तर: कृषि क्रेडिट, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), फसल बीमा योजना, सिंचाई परियोजनाएँ, सहकारी बैंक सुविधा, कृषि विस्तार सेवाएँ और प्रशिक्षण कार्यक्रम।
3. विस्तृत उत्तर वाले प्रश्न (लगभग 120 शब्द)
(i) कृषि उत्पादन में वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा किए गए उपाय:
उत्तर: सरकार ने कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए कई उपाय किए हैं। इनमें उन्नत बीज (HYV) का प्रचार, आधुनिक सिंचाई प्रणाली जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर, कीट और रोग नियंत्रण के लिए आधुनिक तकनीक, उर्वरक प्रबंधन और मिट्टी परीक्षण, कृषि यंत्र और मशीनरी का प्रयोग शामिल हैं। इसके अलावा, किसानों को क्रेडिट, फसल बीमा, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और प्रशिक्षण के माध्यम से आर्थिक व तकनीकी सहायता दी जाती है। इन सुधारों से उपज बढ़ती है, लागत कम होती है और किसानों की आय में सुधार आता है। सतत कृषि प्रथाओं को बढ़ावा मिलता है और प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव कम होते हैं।
(ii) चावल की खेती के लिए उपयुक्त भौगोलिक परिस्थितियाँ:
उत्तर: चावल उष्णकटिबंधीय और उपउष्णकटिबंधीय जलवायु की फसल है। इसे अधिक वर्षा (150–200 सेमी वार्षिक), गर्म तापमान (20–32°C) और उच्च नमी वाली मिट्टी की आवश्यकता होती है। मिट्टी की विशेषता — जल-नमीधारी दोमट या मिट्टी जिसमें पानी स्थायी रूप से रोका जा सके। सिंचाई की सुविधा होने से फसल का उत्पादन बढ़ता है। भारत में पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश प्रमुख चावल उत्पादक राज्य हैं। खेतों में पानी का नियंत्रित बहाव और रोपाई की पद्धति उपज को अधिक बनाती है।
कृषि: 20 MCQs
- कौन-सी फसल गर्म और आर्द्र जलवायु में उगाई जाती है?
a) गेहूँ
b) धान
c) ज्वार
d) बाजरा
उत्तर: b) धान - भारत में ‘स्थानांतरी कृषि’ किस प्रकार की खेती को कहते हैं?
a) एक ही फसल लंबे क्षेत्र में
b) जमीन बदल-बलत करके उगाई जाने वाली फसल
c) गहन कृषि
d) बागवानी
उत्तर: b) जमीन बदल-बलत करके उगाई जाने वाली फसल - खरीफ फसल का सीजन कब होता है?
a) अक्टूबर–मार्च
b) जून–सितंबर
c) मार्च–जून
d) जनवरी–अप्रैल
उत्तर: b) जून–सितंबर - रबी फसल का उदाहरण है?
a) गेहूँ
b) धान
c) मक्का
d) बाजरा
उत्तर: a) गेहूँ - जायद फसलें कब बोई जाती हैं?
a) जून–सितंबर
b) अक्टूबर–मार्च
c) मार्च–जून
d) अप्रैल–अगस्त
उत्तर: c) मार्च–जून - भारत में सबसे अधिक चाय किस राज्य में उगाई जाती है?
a) तमिलनाडु
b) असम
c) कर्नाटक
d) केरल
उत्तर: b) असम - कॉफी की प्रमुख फसल किस राज्य में उगाई जाती है?
a) पंजाब
b) कर्नाटक
c) पश्चिम बंगाल
d) राजस्थान
उत्तर: b) कर्नाटक - भारत में प्रमुख मोटे अनाज की फसल है:
a) ज्वार, बाजरा, मक्का
b) गेहूँ, चना
c) चावल, गन्ना
d) कपास, जूट
उत्तर: a) ज्वार, बाजरा, मक्का - फलीदार फसल का उदाहरण है:
a) दालें
b) गेहूँ
c) मक्का
d) चावल
उत्तर: a) दालें - भारत में प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य है:
a) उत्तर प्रदेश
b) महाराष्ट्र
c) कर्नाटक
d) तमिलनाडु
उत्तर: a) उत्तर प्रदेश - कपास उगाने के लिए उपयुक्त जलवायु है:
a) ठंडी
b) शुष्क और गर्म
c) वर्षा-प्रधान
d) उष्णकटिबंधीय आर्द्र
उत्तर: b) शुष्क और गर्म - जूट की खेती के लिए मिट्टी की आवश्यकता है:
a) रेतीली
b) जल-नमीधारी
c) दोमट शुष्क
d) लाल बलुई
उत्तर: b) जल-नमीधारी - रबड़ की फसल किस जलवायु में अच्छी होती है?
a) ठंडी और शुष्क
b) उष्णकटिबंधीय और आर्द्र
c) शुष्क और गर्म
d) ठंडी और नम
उत्तर: b) उष्णकटिबंधीय और आर्द्र - किस कृषि प्रणाली में एक ही क्षेत्र में एक या दो फसलें गहन रूप से उगाई जाती हैं?
a) गहन कृषि
b) स्थानांतरी कृषि
c) बागवानी
d) झूम कृषि
उत्तर: a) गहन कृषि - कौन-सी फसल उत्तरी भारत के शीतकालीन क्षेत्रों में प्रमुख है?
a) धान
b) गेहूँ
c) ज्वार
d) बाजरा
उत्तर: b) गेहूँ - किस फसल के लिए ढलान वाले और अधिक वर्षा वाले क्षेत्र अनुकूल हैं?
a) चाय
b) गेहूँ
c) ज्वार
d) बाजरा
उत्तर: a) चाय - भारत में जायद फसल का उदाहरण है:
a) तरबूज
b) गेहूँ
c) धान
d) ज्वार
उत्तर: a) तरबूज - भारत में प्रमुख तेलहन फसल कौन-सी है?
a) सरसों
b) धान
c) गेहूँ
d) ज्वार
उत्तर: a) सरसों - कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए भारत में किस प्रकार के सुधार किए गए हैं?
a) प्रौद्योगिकीय और संस्थागत
b) केवल सिंचाई
c) केवल बीज
d) केवल मशीनीकरण
उत्तर: a) प्रौद्योगिकीय और संस्थागत - किस फसल के लिए अधिक पानी की आवश्यकता होती है?
a) धान
b) गेहूँ
c) बाजरा
d) ज्वार
उत्तर: a) धान
External Links – कृषि (Agriculture)
कृषि अध्याय से संबंधित अतिरिक्त अध्ययन सामग्री, प्रश्नोत्तरी और वीडियो के लिए नीचे दिए गए उपयोगी लिंक देखें:
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Agriculture Notes – Extramarks
NCERT Solutions – BYJU’S
LearnCBSE Agriculture Solutions
Agriculture in India – Class 10 Geography (YouTube)
Types of Farming in India Explained (YouTube)
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