अध्याय 3 : जल संसाधन (Water Resources)
जल पृथ्वी पर जीवन का आधार है। यह हमारे पर्यावरण, कृषि, उद्योग, और जीव-जंतुओं के अस्तित्व के लिए सबसे आवश्यक प्राकृतिक संसाधनों में से एक है। जल के बिना जीवन की कल्पना भी असंभव है। भारत जैसे विशाल देश में जल का असमान वितरण एक प्रमुख समस्या है, जिसके कारण कुछ क्षेत्रों में बाढ़ तो कुछ में सूखा जैसी स्थिति उत्पन्न होती है।
इस अध्याय में हम समझेंगे कि भारत में जल संसाधनों का वितरण कैसे है, जल के संरक्षण के पारंपरिक और आधुनिक तरीके क्या हैं, तथा क्यों सतत जल प्रबंधन (Sustainable Water Management) की आवश्यकता आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।
मुख्य विषय:
- भारत में जल संसाधनों का वितरण
- जल संरक्षण की पारंपरिक प्रणालियाँ
- बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ
- भूजल की समस्या और समाधान
- सतत विकास हेतु जल प्रबंधन
जल संसाधन केवल प्राकृतिक संपदा नहीं बल्कि मानव सभ्यता की जीवन रेखा हैं। यदि इनका संरक्षण नहीं किया गया, तो भविष्य में जल संकट मानवता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। इसीलिए, हमें प्रत्येक स्तर पर जल का विवेकपूर्ण उपयोग और संरक्षण करना आवश्यक है।
“हर बूँद कीमती है — जल बचाओ, जीवन बचाओ।”
भारत में जल संसाधनों का वितरण (Distribution of Water Resources in India)
भारत में जल संसाधनों का वितरण अत्यंत असमान है। कुछ क्षेत्रों में नदियाँ और वर्षा प्रचुर मात्रा में जल प्रदान करती हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में वर्षा की कमी के कारण जल संकट बना रहता है। भारत को विश्व के जल-संपन्न देशों में गिना जाता है, फिर भी जल का समान वितरण न होने के कारण जल की उपलब्धता सभी के लिए समान नहीं है।
भारत में प्रमुख जल स्रोत:
- वर्षा (Rainfall)
- नदियाँ (Rivers)
- भूजल (Groundwater)
- झीलें और तालाब (Lakes and Ponds)
- हिमनद (Glaciers)
भारत की कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 4% ही विश्व के कुल जल संसाधनों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि यहाँ विश्व की लगभग 18% जनसंख्या निवास करती है। इस असंतुलन के कारण जल की मांग और आपूर्ति के बीच बड़ा अंतर है।
भारत की प्रमुख नदी प्रणालियाँ
- उत्तर भारत: गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियाँ वर्ष भर जल प्रदान करती हैं।
- दक्षिण भारत: गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, नर्मदा, तापी जैसी नदियाँ मुख्यतः वर्षा पर निर्भर हैं।
- पश्चिमी भारत: राजस्थान और गुजरात के कुछ हिस्सों में जल की भारी कमी है।
- पूर्वोत्तर भारत: यहाँ अत्यधिक वर्षा होती है, जिससे जल संसाधन प्रचुर हैं।
स्पष्ट है कि भारत में जल संसाधन की उपलब्धता भौगोलिक परिस्थितियों, वर्षा वितरण और जनसंख्या घनत्व पर निर्भर करती है। इस असमान वितरण के कारण जल प्रबंधन और संरक्षण की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
जल संरक्षण एवं प्रबंधन (Water Management and Conservation)
भारत जैसे विशाल देश में जल का असमान वितरण और बढ़ती जनसंख्या के कारण जल संकट एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। इसलिए जल का संरक्षण (Conservation) और प्रबंधन (Management) अत्यंत आवश्यक है। जल प्रबंधन का अर्थ है – जल का उचित उपयोग, पुनः उपयोग और संग्रहण इस प्रकार करना कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी यह संसाधन सुरक्षित रह सके।
जल संरक्षण के प्रमुख उद्देश्य:
- जल की बर्बादी रोकना
- वर्षा जल को संरक्षित करना
- भूजल स्तर को बढ़ाना
- सिंचाई एवं घरेलू उपयोग में जल का पुनः उपयोग करना
- सतत विकास हेतु जल का संतुलित प्रयोग
जल प्रबंधन के पारंपरिक उपाय
- कुंए, तालाब और बावड़ी: गाँवों में जल संग्रहण की पुरानी प्रणाली जो आज भी कई स्थानों पर उपयोगी है।
- जोहर एवं खाडिन: राजस्थान में वर्षा जल को रोककर मिट्टी की नमी बनाए रखने की तकनीक।
- एरी प्रणाली (Eri System): दक्षिण भारत में वर्षा जल संग्रहण की प्राचीन व्यवस्था।
- झीलें और जलाशय: शहरी क्षेत्रों में जल संचयन का प्रभावी माध्यम।
आधुनिक जल प्रबंधन के उपाय
- वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting): छतों और भूमि से गिरने वाले वर्षा जल को संग्रहित कर पुनः उपयोग किया जाता है।
- ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई: जल की बचत हेतु आधुनिक कृषि तकनीकें।
- पुनर्चक्रण (Recycling) और पुनः उपयोग: घरेलू व औद्योगिक जल का उपचार कर दोबारा उपयोग।
- वनीकरण: वृक्षों से मिट्टी की नमी और जल का संरक्षण होता है।
- जन जागरूकता: “जल बचाओ, जीवन बचाओ” जैसे अभियान से लोगों में चेतना फैलाना।
इस प्रकार, जल का विवेकपूर्ण उपयोग और संरक्षण हमारी जिम्मेदारी है। यदि प्रत्येक व्यक्ति जल बचाने का संकल्प ले, तो आने वाली पीढ़ियों को भी यह अमूल्य संसाधन उपलब्ध रह सकेगा।
“जल है तो कल है — जल संरक्षण ही जीवन संरक्षण है।”
विभिन्न राज्यों में प्राचीन और नवीन जल संरक्षण विधियाँ
भारत के विभिन्न राज्यों में जल संरक्षण के लिए पारंपरिक और आधुनिक दोनों प्रकार की तकनीकें अपनाई गई हैं। नीचे दी गई तालिका में इन विधियों का विवरण दिया गया है:
| राज्य | प्राचीन जल संरक्षण विधियाँ | नवीन (आधुनिक) जल संरक्षण विधियाँ |
|---|---|---|
| राजस्थान | जोहड़, बावड़ी, तालाब, कुंड | रेन वाटर हार्वेस्टिंग, जल पुनर्भरण परियोजनाएँ |
| गुजरात | वाव (स्टेप वेल्स), तालाब, बांध | नर्मदा योजना, चेक डैम निर्माण |
| मध्य प्रदेश | तालाब, कुंड, बावड़ी | पानी रोको अभियान, सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली |
| उत्तर प्रदेश | तालाब, झील, कुंड | नलकूप आधारित सिंचाई, ड्रिप इरिगेशन |
| महाराष्ट्र | पारंपरिक झीलें, जलाशय | जलयुक्त शिवार योजना, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई |
| तमिलनाडु | एरी (टैंक सिस्टम), कुएं | रेन वाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य, जल पुनर्भरण परियोजनाएँ |
| कर्नाटक | करेज, तालाब, झील | माइक्रो इरिगेशन, वाटरशेड डेवलपमेंट प्रोग्राम |
| हरियाणा | तालाब, कुएं | माइक्रो इरिगेशन सिस्टम, वर्षा जल संचयन |
| केरल | पोंड्स, स्ट्रीम्स | रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग, चेक डैम |
| जम्मू-कश्मीर | सरोवर, झीलें | हाइड्रो प्रोजेक्ट्स, वर्षा जल संचयन |
निष्कर्ष: पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियाँ आज भी ग्रामीण भारत की जीवनरेखा हैं। आधुनिक तकनीकों के साथ इनका समन्वय जल संकट के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
पानी की कमी / दुर्लभता
पानी जीवन का आधार है, किंतु आज विश्व के कई हिस्सों में पानी की कमी एक गंभीर समस्या बन चुकी है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में भी जल संसाधनों का असमान वितरण और अत्यधिक दोहन जल संकट को और बढ़ा रहा है।
पानी की कमी के प्रमुख कारण:
- अत्यधिक दोहन: कृषि, उद्योग और घरेलू उपयोग के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन।
- वर्षा पर निर्भरता: भारत में जल स्रोत मुख्यतः मानसूनी वर्षा पर निर्भर हैं, जो अनियमित होती है।
- वनों की कटाई: वनों के घटने से वर्षा का संतुलन बिगड़ता है और जल संरक्षण क्षमता घटती है।
- जनसंख्या वृद्धि: तेजी से बढ़ती जनसंख्या के कारण जल की मांग बढ़ रही है।
- प्रदूषण: नदियों, झीलों और भूजल का रासायनिक और औद्योगिक प्रदूषण।
जल दुर्लभता के प्रकार:
| प्रकार | विवरण |
|---|---|
| भौतिक जल दुर्लभता | जब किसी क्षेत्र में प्राकृतिक रूप से पानी की मात्रा कम होती है, जैसे रेगिस्तानी क्षेत्र। |
| आर्थिक जल दुर्लभता | जब पानी उपलब्ध तो होता है, परंतु संसाधनों की कमी के कारण उसका उपयोग नहीं हो पाता। |
पानी की कमी के प्रभाव:
- कृषि उत्पादन में गिरावट
- स्वास्थ्य समस्याएँ और स्वच्छ पेयजल की कमी
- उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव
- ग्रामीण-शहरी प्रवास में वृद्धि
- पारिस्थितिक असंतुलन
निष्कर्ष:
यदि समय रहते जल संरक्षण और संतुलित उपयोग की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में जल संकट और भी गहराएगा। अतः प्रत्येक नागरिक को “पानी बचाओ, जीवन बचाओ” के सिद्धांत पर कार्य करना चाहिए।
बहुउद्देशीय नदी परियोजनाएँ (Multipurpose River Projects)
भारत जैसे विशाल देश में नदियाँ न केवल जल की आपूर्ति का प्रमुख स्रोत हैं, बल्कि
ऊर्जा उत्पादन,
सिंचाई,
बाढ़ नियंत्रण
और
परिवहन
के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
इन्हीं उद्देश्यों के लिए सरकार ने अनेक
बहुउद्देशीय नदी परियोजनाएँ
शुरू कीं।
सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण, मत्स्य पालन, जल आपूर्ति, परिवहन, पर्यटन —
उन्हें बहुउद्देशीय नदी परियोजनाएँ कहा जाता है।
मुख्य उद्देश्य:
- सिंचाई के लिए जल उपलब्ध कराना
- जलविद्युत उत्पादन
- बाढ़ नियंत्रण और सूखा राहत
- मृदा संरक्षण और मत्स्य पालन
- पीने के पानी की आपूर्ति और औद्योगिक उपयोग
- पर्यटन एवं नौपरिवहन का विकास
भारत की प्रमुख बहुउद्देशीय नदी परियोजनाएँ:
| परियोजना का नाम | नदी | संबंधित राज्य | मुख्य उद्देश्य |
|---|---|---|---|
| भाखड़ा नांगल परियोजना | सतलज | हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा | सिंचाई, बिजली उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण |
| दामोदर घाटी परियोजना | दामोदर | झारखंड, पश्चिम बंगाल | बाढ़ नियंत्रण, बिजली उत्पादन, सिंचाई |
| हीराकुंड परियोजना | महानदी | ओडिशा | सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण |
| चंबल घाटी परियोजना | चंबल | मध्य प्रदेश, राजस्थान | सिंचाई, बिजली उत्पादन |
| तेहरी बाँध परियोजना | भागीरथी | उत्तराखंड | जलविद्युत, सिंचाई, पेयजल आपूर्ति |
| सरदार सरोवर परियोजना | नर्मदा | गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र | सिंचाई, बिजली उत्पादन, जल आपूर्ति |
लाभ:
- कृषि उत्पादन में वृद्धि
- विद्युत उत्पादन से औद्योगिक विकास
- बाढ़ नियंत्रण और सूखे से राहत
- रोजगार सृजन और पर्यटन का विकास
समस्याएँ:
- स्थानीय लोगों का विस्थापन
- वनों की कटाई और पर्यावरणीय असंतुलन
- जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव
- सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ
निष्कर्ष: बहुउद्देशीय नदी परियोजनाएँ भारत के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं,
परंतु इनके साथ पर्यावरण और समाज के हितों का संतुलन बनाए रखना भी आवश्यक है।
सतत विकास के सिद्धांत के अंतर्गत इन परियोजनाओं का विवेकपूर्ण उपयोग ही भविष्य की कुंजी है।
प्राचीन भारत में जलीय कृतियाँ
भारत में जल-संरक्षण एवं सिंचाई की परंपरा अत्यंत प्राचीन रही है। वैदिक काल से लेकर मौर्य एवं गुप्त काल तक
लोगों ने जल संचयन, नहर, तालाब और बाँध जैसी अनेक योजनाएँ विकसित की थीं।
ये कृतियाँ न केवल कृषि के लिए बल्कि पेयजल और धार्मिक उपयोग के लिए भी महत्वपूर्ण थीं।
सबसे प्राचीन कृत्रिम झील – गिरनार झील (सौराष्ट्र, गुजरात) को मौर्य शासक चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में बनाया गया था।
| काल / साम्राज्य | प्रमुख जलीय कृतियाँ | विशेषताएँ |
|---|---|---|
| सिंधु घाटी सभ्यता | नालियाँ, कुएँ, स्नानागार | उन्नत जल निकासी प्रणाली — मोहनजोदड़ो का ‘महास्नानागार’ प्रसिद्ध। |
| मौर्य काल | गिरनार झील, नहरें | राजकीय नियंत्रण में सिंचाई — ‘अर्थशास्त्र’ में जल कर का उल्लेख। |
| गुप्त काल | तालाब एवं बाँध | कृषि के विस्तार के साथ जलाशयों का निर्माण बढ़ा। |
| दक्षिण भारत (चोल काल) | कल्याणी, एरी (टैंक) | चोलों ने जलाशय और बाँध निर्माण में उच्च स्तर की इंजीनियरिंग दिखाई। |
मुख्य बिंदु:
- जल-संरक्षण भारत की प्राचीन जीवनशैली का हिस्सा था।
- सिंचाई एवं कृषि व्यवस्था के लिए तालाब, कुएँ और नहरें बनाए गए।
- धार्मिक स्थलों के पास जलाशयों का निर्माण पवित्र माना जाता था।
- राजाओं के साथ-साथ स्थानीय जनता भी जल कृतियों के रखरखाव में सहभागी थी।
हीरा कुंड बांध (Hirakund Dam)
हीरा कुंड बांध भारत के ओड़िशा राज्य में मंथन नदी पर स्थित एक प्रसिद्ध बहुउद्देशीय बांध है। यह बांध
कृषि, जल विद्युत उत्पादन और बाढ़ नियंत्रण के लिए बनाया गया है। हीरा कुंड बांध भारत के सबसे बड़े मिट्टी-बैठक वाले बांधों में से एक है।
मुख्य तथ्य:
- निर्माण वर्ष: 1957-1961
- स्थान: मंथन नदी, ओड़िशा, भारत
- बांध का प्रकार: मिट्टी और पत्थर का मिश्रित बांध
- लंबाई: लगभग 25 किलोमीटर
- उद्देश्य: सिंचाई, जल विद्युत उत्पादन और बाढ़ नियंत्रण
- जल विद्युत क्षमता: लगभग 290 मेगावाट
इतिहास और निर्माण
हीरा कुंड बांध का निर्माण 1957 में शुरू हुआ और 1961 में पूरा हुआ। इसका निर्माण ओड़िशा सरकार द्वारा
राष्ट्रीय विकास परियोजना के रूप में किया गया। यह बांध मुख्य रूप से कृषि के लिए जल संग्रह और बाढ़ नियंत्रण के लिए डिजाइन किया गया था।
संरचना और डिजाइन
हीरा कुंड बांध मिट्टी और पत्थर के मिश्रण से बनाया गया है। इसकी कुल लंबाई लगभग 25 किलोमीटर है, जो इसे
भारत के सबसे लंबे बांधों में से एक बनाती है। इसमें जल विद्युत उत्पादन के लिए एक पावर हाउस भी स्थापित है।
प्रमुख उद्देश्य
- सिंचाई: आसपास के क्षेत्रों में कृषि हेतु जल प्रदान करना।
- जल विद्युत उत्पादन: क्षेत्रीय बिजली की आपूर्ति।
- बाढ़ नियंत्रण: मानसून के दौरान नदी के पानी को नियंत्रित करना।
- जल आपूर्ति: आसपास के शहरों और गांवों में पेयजल आपूर्ति।
महत्वपूर्ण तथ्य:
- हीरा कुंड बांध मंथन नदी और उसका परिवेशीय क्षेत्र दोनों के लिए जीवनदायिनी है।
- यह बांध ओड़िशा के किसानों की सिंचाई जरूरतों को पूरा करता है।
- बांध के पास पर्यटन स्थल भी विकसित हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ होता है।
भौगोलिक स्थिति
हीरा कुंड बांध ओड़िशा राज्य के पश्चिमी हिस्से में स्थित है। यह बांध मंथन नदी के जल को संग्रहित करता है
और आसपास के जिलों में वितरित करता है।
नज़दीकी शहर: Sambalpur
पर्यटन और आकर्षण
हीरा कुंड बांध एक प्रमुख पर्यटन स्थल भी है। यहां पर्यटक प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद ले सकते हैं और
जलाशय की सैर कर सकते हैं। आसपास के क्षेत्र में कई ऐतिहासिक स्थल और वन्यजीव अभयारण्य भी हैं।
नर्मदा बचाओ आंदोलन (Narmada Bachao Andolan)
नर्मदा बचाओ आंदोलन भारत का एक प्रमुख सामाजिक और पर्यावरण आंदोलन है, जो नर्मदा नदी पर बने
सिंचाई और जल विद्युत परियोजनाओं के विरोध में शुरू हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य नर्मदा नदी
और उससे प्रभावित लोगों के अधिकारों की रक्षा करना है। आंदोलन ने पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक न्याय और
विस्थापितों के पुनर्वास के मुद्दों को व्यापक रूप से उठाया।
मुख्य तथ्य:
- शुरुआत: 1985 के दशक में
- मुख्य परियोजना: नर्मदा नदी पर सागरमाला, सैको और अन्य बांध
- प्रधान नेता: मेदा भारती, सुधीर चौधरी, और गोपाल पेंढारे
- मुख्य उद्देश्य: विस्थापितों का पुनर्वास, पर्यावरण संरक्षण, और नर्मदा परियोजनाओं के जिम्मेदार संचालन की मांग
इतिहास और कारण
नर्मदा नदी पर कई बड़े बांध बनाए गए थे, जैसे सागरमाला और सतपुड़ा परियोजनाएं, जिनसे
हजारों लोग अपने घरों और खेती योग्य जमीन से विस्थापित हो रहे थे।
इन परियोजनाओं में पर्यावरण और सामाजिक प्रभाव की उचित जांच न होने के कारण नर्मदा बचाओ आंदोलन शुरू हुआ।
आंदोलन के प्रमुख उद्देश्य
- नर्मदा परियोजनाओं के विस्थापन प्रभावित लोगों के पुनर्वास की मांग।
- पर्यावरण संरक्षण और नदी पारिस्थितिकी की रक्षा।
- सरकार से पारदर्शिता और परियोजना के जवाबदेही की मांग।
- स्थानीय समुदायों और आदिवासियों के अधिकारों की सुरक्षा।
महत्वपूर्ण तथ्य:
- नर्मदा बचाओ आंदोलन ने भारत में पर्यावरण और सामाजिक न्याय आंदोलन को नई दिशा दी।
- इस आंदोलन ने बड़े जल संसाधन परियोजनाओं में सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों पर ध्यान केंद्रित किया।
- विश्व स्तर पर यह आंदोलन मानवाधिकार और पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरणादायक माना गया।
परिणाम और उपलब्धियां
- सरकार ने कई प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए योजनाएं बनाई।
- परियोजनाओं में पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों के मूल्यांकन की प्रक्रिया में सुधार हुआ।
- भारत में जल परियोजनाओं पर सामाजिक न्याय और पर्यावरण संरक्षण का महत्व बढ़ा।
वर्षा जल संग्रहण (Rainwater Harvesting)
वर्षा जल संग्रहण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से वर्षा के पानी को संग्रहित करके
भविष्य में उपयोग के लिए रखा जाता है। यह तकनीक जल संकट को कम करने, भूजल स्तर बढ़ाने और
पर्यावरण संरक्षण में मदद करती है।
मुख्य तथ्य:
- उद्देश्य: जल संरक्षण और भूजल स्तर में वृद्धि।
- प्रमुख विधियां: छत से जल संग्रहण, तालाब/झील निर्माण, पाइपलाइन के माध्यम से संग्रहण।
- लाभ: पीने योग्य पानी की उपलब्धता, बाढ़ नियंत्रण, कृषि और पर्यावरण संरक्षण।
- उपयोग: घरेलू, कृषि, औद्योगिक और सार्वजनिक जल आपूर्ति।
वर्षा जल संग्रहण के तरीके
- छत आधारित संग्रहण: वर्षा के पानी को छत पर इकट्ठा कर स्टोरेज टैंक में रखा जाता है।
- भूमि संचयन: तालाब, झील या पोंड बनाकर वर्षा जल को संग्रहित किया जाता है।
- पाइपलाइन और नालियां: वर्षा के पानी को नालियों और पाइपलाइन के माध्यम से संग्रहित स्थान पर पहुंचाया जाता है।
- इंफिल्ट्रेशन पिट/पिट वेल: वर्षा जल को जमीन में समाहित करके भूजल स्तर बढ़ाया जाता है।
वर्षा जल संग्रहण के लाभ:
- भूजल स्तर में वृद्धि और पानी की उपलब्धता सुनिश्चित।
- सूखा प्रभावित क्षेत्रों में कृषि और पेयजल की सहायता।
- बाढ़ और जल संकट के जोखिम को कम करना।
- पर्यावरण संरक्षण और जल चक्र को संतुलित रखना।
महत्व और निष्कर्ष
वर्षा जल संग्रहण आधुनिक जल प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह न केवल जल संकट को कम करता है,
बल्कि सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान देता है। हर व्यक्ति और समुदाय को इसे अपनाना चाहिए
ताकि भविष्य में जल संकट से बचा जा सके।
विभिन्न राज्यों में वर्षा जल संग्रहण की विधियां
भारत में विभिन्न राज्यों में जल संकट और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार वर्षा जल संग्रहण की अलग-अलग प्राचीन और आधुनिक विधियां अपनाई जाती हैं। नीचे एक सारणी में प्रमुख राज्यों और उनकी विधियों को दिखाया गया है:
| राज्य | प्राचीन विधियां | आधुनिक विधियां |
|---|---|---|
| राजस्थान | तालाब (पानी के पोखर), कुंए, जोहड़, बावड़ी | टैंक आधारित संग्रहण, छत से जल संग्रहण, पिट वेल |
| महाराष्ट्र | कोल्हापुरी बावड़ी, तालाब और जलधार | रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग, झील पुनर्निर्माण |
| तमिलनाडु | कुंड और टैंकर तालाब, चेट्टिकुंड | छत जल संग्रहण, भूजल पुनर्भरण संरचना |
| कर्नाटक | तलाब, कुएं, ओटावडी (पानी के गड्ढे) | छत और गटर से जल संग्रहण, पाइपलाइन प्रणाली |
| गुजरात | वाव/बावड़ी, तालाब और चाक़ | रोफटॉप हार्वेस्टिंग, भूजल पुनर्भरण संरचना |
| हरियाणा | तालाब, नहरों और चेक डैम | रूफटॉप जल संग्रहण, छोटे तालाब/पिट वेल |
अभ्यास प्रश्न एवं उत्तर – जल संसाधन
1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
(i) नीचे दी गई सूचना के आधार पर स्थितियों को वर्गीकृत कीजिए:
| स्थिति | वर्गीकरण |
|---|---|
| (क) अधिक वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र | जल की कमी से अप्रभावित |
| (ख) अधिक वर्षा और अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्र | जल की कमी से प्रभावित |
| (ग) अधिक वर्षा वाले परंतु अत्यधिक प्रदूषित जल क्षेत्र | जल की कमी से प्रभावित |
| (घ) कम वर्षा और कम जनसंख्या वाले क्षेत्र | जल की कमी से प्रभावित |
(ii) बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं के पक्ष में दिया गया तर्क नहीं:
उत्तर: (ग) बहुउद्देशीय परियोजनाओं से बृहत् स्तर पर विस्थापन होता है और आजीविका खत्म होती है।
(iii) गलत वक्तव्यों को सही करें:
- (क) शहरों की बढ़ती संख्या, उनकी विशालता और सघन जनसंख्या तथा शहरी जीवन शैली ने जल संसाधनों के सही उपयोग में बाधा डाली है।
- (ख) नदियों पर बाँध बनाने और उन्हें नियंत्रित करने से उनका प्राकृतिक बहाव और तलछट बहाव प्रभावित होता है।
- (ग) गुजरात में साबरमती बेसिन में सूखे के दौरान शहरी क्षेत्रों में अधिक जल आपूर्ति करने पर किसानों ने विरोध किया।
- (घ) आज राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर से उपलब्ध पेयजल के बावजूद छत वर्षा जल संग्रहण लोकप्रिय हो रहा है।
2. उत्तर लगभग 30 शब्दों में
(i) व्याख्या करें कि जल किस प्रकार नवीकरणीय संसाधन है?
जल नवीकरणीय संसाधन है क्योंकि यह प्राकृतिक जल चक्र के माध्यम से लगातार वर्षा, नदियों, झीलों और भूजल के रूप में पुनः उपलब्ध होता है।
(ii) जल दुर्लभता क्या है और इसके मुख्य कारण क्या हैं?
जल दुर्लभता वह स्थिति है जब किसी क्षेत्र में उपलब्ध जल उसकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होता। मुख्य कारण हैं: अत्यधिक उपयोग, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और असमान वर्षा वितरण।
(iii) बहुउद्देशीय परियोजनाओं से होने वाले लाभ और हानियों की तुलना करें।
लाभ: सिंचाई, विद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण, पेयजल उपलब्धता।
हानियाँ: विस्थापन, पर्यावरणीय क्षति, तलछट बहाव प्रभावित होना, सामाजिक संघर्ष।
3. उत्तर लगभग 120 शब्दों में
(i) राजस्थान के अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में वर्षा जल संग्रहण किस प्रकार किया जाता है?
राजस्थान के अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में वर्षा जल संग्रहण के लिए प्राचीन और आधुनिक पद्धतियाँ अपनाई जाती हैं। तालाब, बावड़ी, कुंए और जोहड़ बनाकर वर्षा जल को संग्रहित किया जाता है। यह जल खेती, पशुपालन और घरेलू उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जाता है। छतों से जल को पाइप और टैंकर के माध्यम से स्टोर किया जाता है। भूमि में छोटे गड्ढे और पिट बनाकर भूजल स्तर बढ़ाया जाता है। इससे सूखा प्रभावित क्षेत्रों में जल उपलब्धता सुनिश्चित होती है और जल संकट कम होता है। यह पद्धति स्थानीय लोगों द्वारा सामूहिक प्रयास से संचालित की जाती है।
(ii) परंपरागत वर्षा जल संग्रहण की पद्धतियों को आधुनिक काल में अपनाकर जल संरक्षण एवं भंडारण किस प्रकार किया जा रहा है?
आज आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके परंपरागत वर्षा जल संग्रहण पद्धतियों को और प्रभावी बनाया जा रहा है। छतों से जल संग्रहण के लिए पाइपलाइन और टैंक लगाए जाते हैं। पुराने तालाब, बावड़ी और कुंओं की मरम्मत करके उनका जल भंडारण बढ़ाया जाता है। भूजल पुनर्भरण पिट और वेल बनाए जाते हैं। स्मार्ट जल प्रबंधन प्रणाली, फिल्टर और सिंचाई नियंत्रण के माध्यम से जल का कुशल उपयोग किया जाता है। इससे न केवल जल संकट कम होता है बल्कि भूजल स्तर में वृद्धि और कृषि, उद्योग तथा घरेलू उपयोग में स्थायी जल आपूर्ति सुनिश्चित होती है।
जल संसाधन – 20 MCQ
- जल संसाधन क्या है?
(a) केवल नदियाँ और झीलें
(b) पृथ्वी पर उपलब्ध सभी जल स्रोत ✔
(c) केवल वर्षा जल
(d) केवल भूजल - भूजल मुख्यतः कहाँ से प्राप्त होता है?
(a) समुद्र
(b) नदियाँ
(c) जल भंडार/अक्विफर ✔
(d) वर्षा जल टंकी - जल की कमी से प्रभावित क्षेत्र कौन सा है?
(a) अधिक वर्षा वाले क्षेत्र
(b) कम वर्षा और अधिक जनसंख्या वाला क्षेत्र ✔
(c) अधिक वर्षा और कम जनसंख्या वाला क्षेत्र
(d) सभी क्षेत्र - बहुउद्देशीय नदी परियोजना का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
(a) सिंचाई, विद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण ✔
(b) केवल पर्यटन
(c) केवल जल संग्रहण
(d) केवल उद्योग - वर्षा जल संग्रहण का मुख्य लाभ क्या है?
(a) भूजल स्तर में वृद्धि ✔
(b) प्रदूषण बढ़ाना
(c) जल की कमी बढ़ाना
(d) बाढ़ बढ़ाना - नर्मदा बचाओ आंदोलन क्यों शुरू हुआ?
(a) जल संकट कम करने के लिए
(b) नर्मदा परियोजनाओं के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव के विरोध में ✔
(c) बिजली उत्पादन बढ़ाने के लिए
(d) केवल कृषि के लिए - वर्षा जल संग्रहण की आधुनिक पद्धति क्या है?
(a) तालाब निर्माण
(b) छत से पाइपलाइन के माध्यम से संग्रहण ✔
(c) नदी पर बाँध
(d) कुएँ का गहरा करना - भारत में सबसे बड़ा बहुउद्देशीय बांध कौन सा है?
(a) हीरा कुंड बांध ✔
(b) इंदिरा गांधी नहर
(c) ताप्ती बांध
(d) सागरमाला बांध - जल संसाधन नवीकरणीय क्यों है?
(a) यह कभी समाप्त नहीं होता
(b) यह वर्षा और जल चक्र के माध्यम से लगातार पुनः उपलब्ध होता है ✔
(c) केवल नदियों से मिलता है
(d) केवल समुद्र से आता है - भूजल स्तर बढ़ाने के लिए कौन सा उपाय किया जाता है?
(a) जल संग्रहण पिट/पिट वेल ✔
(b) जल बहाव रोकना
(c) नदी प्रदूषण
(d) सिंचाई बंद करना - बहुउद्देशीय परियोजनाओं का पर्यावरण पर प्रभाव क्या हो सकता है?
(a) प्राकृतिक बहाव और तलछट प्रभावित होना ✔
(b) जल आपूर्ति बढ़ाना
(c) बिजली उत्पादन
(d) केवल लाभ - राजस्थान में वर्षा जल संग्रहण के लिए किस पद्धति का उपयोग होता है?
(a) बावड़ी, तालाब, कुंए ✔
(b) समुद्र जल
(c) नहरों का पानी
(d) केवल पाइपलाइन - नदियों पर बांध बनाने से क्या लाभ होता है?
(a) बाढ़ नियंत्रण ✔
(b) पर्यावरणीय क्षति
(c) विस्थापन
(d) सभी - जल दुर्लभता का मुख्य कारण क्या है?
(a) असमान वर्षा ✔
(b) पर्याप्त वर्षा
(c) अधिक झीलें
(d) समुद्र का पानी - नर्मदा बचाओ आंदोलन के प्रमुख नेता कौन हैं?
(a) मेदा भारती और गोपाल पेंढारे ✔
(b) इंदिरा गांधी
(c) चंद्रशेखर और मोदी
(d) केवल किसानों - भूजल संरक्षण के लिए कौन सी तकनीक अपनाई जाती है?
(a) वर्षा जल संग्रहण ✔
(b) जल का बर्बाद करना
(c) प्रदूषण बढ़ाना
(d) नदी को सूखा करना - भारत में वर्षा जल संग्रहण की आवश्यकता क्यों है?
(a) जल संकट कम करने के लिए ✔
(b) केवल उद्योग के लिए
(c) केवल पेयजल के लिए
(d) केवल पर्यटन के लिए - बहुउद्देशीय परियोजनाओं का सामाजिक प्रभाव क्या हो सकता है?
(a) विस्थापन और आजीविका प्रभावित होना ✔
(b) केवल लाभ
(c) कोई प्रभाव नहीं
(d) जल स्तर बढ़ना - वर्षा जल संग्रहण का पर्यावरण पर क्या लाभ है?
(a) भूजल स्तर बढ़ाना और जल संकट कम करना ✔
(b) प्रदूषण बढ़ाना
(c) नदी सूखाना
(d) जंगल काटना - हीरा कुंड बांध किस नदी पर स्थित है?
(a) मंथन नदी ✔
(b) नर्मदा
(c) गंगा
(d) साबरमती
जल संसाधन के बारे में और अधिक पढ़ें –
- Central Water Commission – India
- Narmada Bachao Andolan Official Site
- India Water Portal
- Rainwater Harvesting Information
- UN Water – Global Water Resources
- World Wildlife Fund – Freshwater Conservation
- Tamil Nadu Rainwater Harvesting Portal
- NITI Aayog – Water Resources & Management
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