Class -7- Science NCERT Notes in hindi

class 7 science ncert notes in hindi 

Class 7 science ncert notes in hindi:-


1. Nutrition in Plants (पौधों में पोषण)

पौधों में पोषण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा वे अपने विकास और जीवन क्रियाओं के लिए आवश्यक ऊर्जा और पदार्थ प्राप्त करते हैं। अधिकांश पौधे स्वतःपोषी (autotrophic) होते हैं और प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) के माध्यम से जल, कार्बन डाइऑक्साइड और सूर्य के प्रकाश से कार्बोहाइड्रेट (शक्कर) बनाते हैं। प्रकाश संश्लेषण क्लोरोफिल नामक हरित वर्णक की उपस्थिति में क्लोरोप्लास्ट में होता है। पौधों को पोषक तत्व तीन स्रोतों से मिलते हैं: मिट्टी से खनिज लवण, हवा से CO₂ और पानी से जल। कुछ पौधे परजीवी (parasites) या अर्ध-पारजीवी रूप से भी पोषण करते हैं।

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पौधों में पोषण के प्रकार: (1) प्रकाश-संश्लेषण — पत्तियों में प्रकाश से ऊर्जा प्राप्त कर ग्लूकोज बनाना; (2) रासायनिक पोषण — कुछ बैक्टीरिया रसायनिक ऊर्जा का उपयोग करते हैं; (3) हेटेरोट्रॉफिक पौधे — जैसे जाइवोत्पी (कम्पोस्ट पर निर्भर) और मूसलाहारी पौधे (insectivorous) जो जीवों को खाते हैं। पौधों में पोषण के प्रयोगों में प्रकाश की आवश्यकता, क्लोरोप्लास्ट की भूमिका और पादपों पर पोषक तत्वों के प्रभाव को समझाया जाता है।

2. Nutrition in Animals (जानवरों में पोषण)

जानवरों में पोषण heterotrophic होता है — वे स्वयं भोजन बनाते नहीं हैं, बल्कि अन्य जीवों या पौधों को खाकर ऊर्जा और पोषक तत्व लेते हैं। जानवरों का पाचन तंत्र सरल से जटिल तक भिन्न होता है। प्राथमिक प्रकार: शुष्कनाड़ियों (अर्थात रेट्यकुलम), किटानी (invertebrates) और स्तनधारी जिनमें अलग-अलग पाचन तंत्र एवं एंज़ाइम्स होते हैं। मानवों में प्राइमरी पोषक तत्व—कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन और खनिज—स्वस्थ वृद्धि एवं क्रियाओं के लिए आवश्यक हैं।

पाचन की प्रक्रिया में भोजन का मेकैनिकल और केमिकल टूटना शामिल है। मुँह में चबाने, लार के एन्जाइम्स, अमाशय में अम्ल और एन्जाइम्स, तथा छोटी आंत में अवशोषण प्रमुख चरण हैं। भोजन को ऊर्जा और बिल्डिंग ब्लॉक्स में तोड़ने के बाद रक्त के माध्यम से कोशिकाओं तक पहुंचाया जाता है। भोजन के प्रकार, पोषण संबंधी समस्या (कुपोषण, विटामिन की कमी) और संतुलित आहार का महत्व भी बताया जाता है।

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3. Heat (ऊष्मा)

ऊष्मा और तापमान जीवन और प्रकृतिक प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण हैं। तापमान पदार्थ की औसत काइनेटिक ऊर्जा को दर्शाता है। ऊष्मा (heat) ऊर्जा का वह रूप है जो तापमान अंतर के कारण एक वस्तु से दूसरी वस्तु में स्थानान्तरित होता है। ऊष्मा के तीन प्रमुख संचरण के तरीके होते हैं: चालन (conduction) — सघन माध्यम में कणों के टकराने से; संवहन (convection) — द्रवों या गैसों के बड़े हिस्सों के स्थानांतरण से; विकिरण (radiation) — बिना माध्यम के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों द्वारा (जैसे सूर्य की किरणें)।

ताप का मापन थर्मामीटर से किया जाता है और तापमान की इकाइयाँ सेल्सियस और केल्विन प्रमुख हैं। ऊष्मा के प्रभावों में तापमान परिवर्तन से पदार्थ का अवस्था परिवर्तन (ठोस↔द्रव↔गैस), गैसों के विस्तार, पदार्थ का आयतन व घनत्व परिवर्तन शामिल हैं। ऊष्मीय नियमन—जीवों में तापमान नियंत्रित रखना भी महत्वपूर्ण है; कुछ जीव होमोईथर्मिक और कुछ पोikilothermic होते हैं।

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4. Acids, Bases and Salts (अम्ल, क्षार और लवण)

अम्ल (acids) वे रसायन हैं जो जल में हाइड्रोजन आयन (H⁺) प्रदान करते हैं और क्षार/base वे रसायन हैं जो हाइड्रॉक्साइड आयन (OH⁻) प्रदान करते हैं। pH स्केल 0 से 14 तक होता है; 7 तटस्थ, 0-6 अम्लीय और 8-14 क्षारीय माने जाते हैं। आम उदाहरणों में नींबू का रस और सिरका अम्लीय, साबुन व मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड क्षारीय हैं।

अम्ल और क्षार के बीच प्रतिक्रिया से लवण (salt) और जल बनते हैं — इसे तटस्थ करण (neutralization) कहते हैं। लवण NaCl जैसे आम खाने के नमक से लेकर CaCO₃ जैसे निर्माणात्मक खनिज तक हो सकते हैं। pH का मापन इंडिकेटर (जैसे लाल गोला, नीली गोला, यूनिवर्सल इंडिकेटर) से किया जाता है। अम्ल, क्षार और लवण का रोज़मर्रा जीवन, उद्योग और पर्यावरण में महत्व बहुत बड़ा है — मिट्टी का pH, पानी की अम्लता, खाद्य पदार्थों की प्रक्रिया आदि पर असर डालता है।

5. Physical and Chemical Changes (भौतिक और रासायनिक परिवर्तन)

भौतिक परिवर्तन (physical change) में पदार्थ का केवल रूप या अवस्था बदलती है पर उसकी रासायनिक संरचना अपरिवर्तित रहती है — जैसे पानी का बर्फ बनना, कपड़े का कटना, कागज़ का फटना। रासायनिक परिवर्तन (chemical change) में पदार्थ की रासायनिक संरचना बदल जाती है और नए पदार्थ बनते हैं — जैसे लोहे का जंग लगना, लकड़ी का जलना, दूध का दही बनना।

परिवर्तनों की पहचान के संकेतों में रंग परिवर्तन, गैस का निकलना, अवक्षेप का बनना, उष्मा या प्रकाश का उत्सर्जन शामिल हैं। प्रयोगों के जरिए भौतिक और रासायनिक बदलावों को दर्शाया जाता है और यह समझाया जाता है कि रासायनिक बदलावों में ऊर्जा का लेन-देन और रियेक्टेंट्स से प्रॉडक्ट्स का रूपांतरण होता है।

6. Respiration in Organisms (जीवों में श्वसन)

श्वसन (respiration) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीव अपने शरीर में ऊष्मा और ऊर्जा के लिए खाद्य पदार्थों का ऑक्सीकरण करते हैं। श्वसन दो प्रकार का होता है: बाह्य श्वसन (external respiration) — जिसमें गैसों का आदान-प्रदान (प्राण व कार्बन डाइऑक्साइड) फेफड़ों या गिल्स के माध्यम से होता है; और कोशिकीय श्वसन (cellular respiration) — जिसमें कोशिकाओं के मिथोकॉन्ड्रिया में ग्लूकोज का ऑक्सीजन की सहायता से ऑक्सीडेशन होता है और ऊर्जा (ATP), CO₂ व जल बनते हैं।

श्वसन में एरोबिक (ऑक्सीजन प्रयोग करके) और एनेरोबिक (बिना ऑक्सीजन) तरीके होते हैं। एनेरोबिक श्वसन के उदाहरणों में खमीर द्वारा किण्वन और मांसपेशियों में तीव्र व्यायाम पर लैक्टिक एसिड बनना शामिल है। श्वसन प्रणाली का अध्ययन श्वसन अंगों (नासिका, वायु मार्ग, फेफड़े) और उनके कार्य को समझने में मदद करता है।

7. Transportation in Animals and Plants (पौधों और जानवरों में परिवहन)

परिवहन उन प्रक्रियाओं को दर्शाता है जिनसे पोषक तत्व, गैसें, जल और अपशिष्ट पदार्थ शरीर या पौधों के विभिन्न भागों में पहुँचते हैं। जानवरों में रक्त परिसंचरण (blood circulation) महत्वपूर्ण है। मानव में रक्त हृदय द्वारा पंप होकर रक्तवाहिकाओं — धमनी, शिरा और केशिका — में प्रवाहित होता है। रक्त ऑक्सीजन, पोषक और हार्मोनों को कोशिकाओं तक पहुँचाता है और अपशिष्ट उत्पादों को गुर्दे व अन्य अंगों तक पहुंचाकर निष्कासन में मदद करता है।

पौधों में जल और खनिज जड़ों से ऊर्ध्वगामी xylem में चढ़ते हैं और पत्तियों से फोटोसिंथेसाइज़ड खाद्य पदार्थ phloem में नीचे-ऊपर दोनों दिशाओं में परिवहन होते हैं। वाष्पोत्सर्जन (transpiration) और जड़ दबाव तथा जलीय रसायन बलों का संयोजन जल के ऊर्ध्वगमन में सहायक होता है। पौधों और जानवरों में परिवहन के तंत्र का ज्ञान उनके स्वास्थ्य, खेती और पारिस्थितिकी के लिए आवश्यक है।

8. Reproduction in Plants (पौधों में प्रजनन)

पौधों में प्रजनन दो प्रकार का होता है: अलैंगिक प्रजनन (asexual) और यौनिक प्रजनन (sexual)। अलैंगिक प्रजनन में केवल एक अभिभावक की अवश्यकता होती है और संतति माता-पिता से जीन रूप से समान होती है — जैसे कटिंग, पत्ती के द्वारा, कंद, पल्लव के द्वारा उत्पादन। यौनिक प्रजनन में फूलों के माध्यम से परागण (pollination) और फल-बीज निर्माण होता है। परागकणों को परागण के लिए हवा, पानी या कीटों द्वारा ले जाया जा सकता है।

फूल के प्रमुख अंगों में पुंकेसर (stamen) और स्त्रीकेसर (pistil) होते हैं। परागकण अंडाशय तक पहुँच कर निषेचन करते हैं और बीज का निर्माण होता है। बीज में भ्रूण, भोजन द्रव्य और बीज आवरण होता है। प्रजनन के अध्ययन से पौधों की प्रजाति संरक्षण, ब्रीडिंग और कृषि उत्पादन में मदद मिलती है।

9. Motion and Time (गति और समय)

गति (motion) किसी वस्तु के स्थान परिवर्तन को संदर्भित करती है और इसे दूरी पर समय निकाल कर परिभाषित किया जाता है — गति = दूरी / समय। गति के प्रकारों में स्थिर गति, परिवर्ती गति और तात्कालिक गति शामिल हैं। गति की दिशा और परिमाण दोनों को ध्यान में रखते हुए वेक्टर और मात्रक समझ का उपयोग होता है। समय की मापन इकाइयाँ जैसे सेकंड, मिनट, घंटा आदि प्रयोग में लाए जाते हैं।

गति के अध्ययन में गति-सम्बन्धी ग्राफ, दूरी बनाम समय और गति बनाम समय ग्राफों का उपयोग किया जाता है। सरल यांत्रिकी—दूरी, विस्थापन, चाल (speed), वेग (velocity), त्वरण (acceleration) — इनकी समझ रोजमर्रा की समस्याओं और विज्ञान के मूलभूत नियमों के लिए आवश्यक है। समय के सही मापन से गति के नियमों का प्रयोग और गणना संभव होती है।

10. Electric Current and its Effects (विद्युत धारा और इसके प्रभाव)

विद्युत धारा तब प्रवाहित होती है जब चार्ज कण एक चालक माध्यम में व्यवस्थित रूप से प्रवाहित होते हैं। विद्युत धारा के प्रभावों में हीटिंग प्रभाव (जैसे बल्ब की फिलामेंट गर्म होना), चुंबकीय प्रभाव (करंट के कारण चुंबकीय क्षेत्र बनना), और रासायनिक प्रभाव (इलेक्ट्रोलिसिस) शामिल हैं। विद्युत परिपथ (circuit) में स्रोत (ब्याटरी), कंडक्टर और लोड (उपकरण) होते हैं।

सुरक्षा के नियम, सीरिज और पैरेलल परिपथ, करंट और वोल्टेज की मूल अवधारणाएँ इस अध्याय में पढ़ाई जाती हैं। करंट के हानिकारक प्रभाव जैसे झटका और आग, और उनसे बचाव के उपाय जैसे अर्श प्रकार के फ्यूज़, अर्थिंग और सुरक्षात्मक उपकरणों की जानकारी दी जाती है।

11. Light (प्रकाश)

प्रकाश उस ऊर्जा का रूप है जिसे हमारी आँखें देख सकती हैं। यह तरंग-गुण और कण-गुण दोनों दिखा सकता है। प्रकाश के गुणों में सीधी रेखा में प्रकीर्णन, परावर्तन (reflection) और अपवर्तन (refraction) शामिल हैं। प्रत्यावर्तन के नियम (incidence = reflection) और सन्निकटन नियम (refraction और अपवर्तन सूचकांक) इस अध्याय का हिस्सा हैं।

छाया, आभास (perception), दर्पण और लेंस के प्रयोगों से प्रकाश का व्यवहार समझाया जाता है। संयमित प्रयोगों में प्रकाश की रेखीय प्रकीर्णन, संरेखण और लेंसों द्वारा इमेज बनाना शामिल है। प्रकाश और हमारी दैनंदिन जीवन में उसकी उपयोगिता — दृश्यता, रंग, उर्जा आदि अध्याय में पढ़ाई जाती है।

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12. Forests: Our Lifeline (वन: हमारी जीवनरेखा)

वन पृथ्वी के पर्यावरण और जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। वे ऑक्सीजन का स्रोत, कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने वाले कारक, जैव विविधता के आवास और जलवायु नियंत्रक होते हैं। वनों के संरक्षण से मिट्टी अपरदन रोका जा सकता है, जलचक्र बनाए रखा जाता है और पारिस्थितिक तंत्र की स्थिरता बनी रहती है।

वनों पर मनुष्यों के प्रभाव—कटाई, आग, अतिक्रमण और प्रदूषण—जैव विविधता में कमी और जलवायु परिवर्तन के कारण बनते हैं। संरक्षण के उपायों में पुनरारोपण (afforestation), सतत प्रबंधन, संरक्षित क्षेत्र और स्थानीय समुदायों का शामिल होना चाहिए। इस अध्याय में वनों के प्रकार, महत्व और संरक्षण संबंधी नीतियाँ समझाई जाती हैं।

13. Wastewater Story (अपशिष्ट जल की कहानी)

अपशिष्ट जल (wastewater) में घरेलू, औद्योगिक और कृषि स्रोतों से निकला पानी शामिल होता है जिसमें जैविक अपशिष्ट, रसायन और सूक्ष्मजीव होते हैं। यदि अपशिष्ट जल का सही प्रकार से उपचार न किया जाए तो यह मानव स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।

अपशिष्ट जल के उपचार के चरणों में प्राथमिक उपचार (ठोस कणों का निस्पंदन), द्वितीयक (जैविक अपशिष्ट को घटाना) और तृतीयक उपचार (रोगाणु नाश, पोषक तत्वों का नियंत्रण) शामिल होते हैं। स्लज प्रबंधन और पुन: उपयोग (recycling) भी आवश्यक है। इस अध्याय में पानी की गुणवत्ता, उपचार पद्धतियाँ और स्वच्छता के महत्व पर जोर दिया जाता है ताकि जल स्रोतों का संरक्षण हो सके और रोगों का प्रसार रोका जा सके।


Class 7 Science – Other Useful sources

नीचे कक्षा 7 विज्ञान से संबंधित अन्य उपयोगी लिंक दिए गए हैं, जिनसे आप नोट्स, सॉल्यूशन, पीडीएफ और बुक्स डाउनलोड कर सकते हैं।

Source: NCERT Official Website

 

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