अध्याय – विनिर्माण उद्योग (Manufacturing Industries)
परिचय:
विनिर्माण उद्योग किसी भी देश की आर्थिक प्रगति की रीढ़ होते हैं। यह प्राथमिक (Primary) वस्तुओं को रूपांतरित कर द्वितीयक (Secondary) वस्तुएँ तैयार करते हैं, जैसे कपड़ा, लोहा-इस्पात, सीमेंट, वाहन, रसायन आदि। उद्योग न केवल रोजगार प्रदान करते हैं, बल्कि निर्यात के माध्यम से विदेशी मुद्रा अर्जित करते हैं।
| उद्योग का प्रकार | उदाहरण | मुख्य विशेषताएँ |
|---|---|---|
| लघु उद्योग | हथकरघा, मिट्टी के बर्तन | कम पूँजी और स्थानीय कच्चा माल |
| मध्यम उद्योग | खाद्य प्रसंस्करण, फर्नीचर | मध्यम पूँजी निवेश |
| भारी उद्योग | लौह-इस्पात, सीमेंट, वाहन निर्माण | बड़ी पूँजी, मशीनों और बिजली की अधिक आवश्यकता |
भारत का पहला आधुनिक औद्योगिक नगर जमशेदपुर है, जहाँ टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) की स्थापना 1907 में हुई थी।
महत्वपूर्ण तथ्य:
- विनिर्माण उद्योग राष्ट्रीय आय में बड़ा योगदान देता है।
- यह कृषि और सेवा क्षेत्र के बीच संतुलन स्थापित करता है।
- औद्योगिक विकास से शहरीकरण और रोजगार दोनों में वृद्धि होती है।
विनिर्माण का महत्व (Importance of Manufacturing)
परिचय:
विनिर्माण केवल वस्तुओं के उत्पादन की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह किसी भी देश की आर्थिक शक्ति, प्रगति और विकास का आधार है। यह कच्चे माल को उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित कर समाज और राष्ट्र दोनों की उन्नति में योगदान देता है।
विनिर्माण के प्रमुख महत्व:
- 1. आर्थिक विकास में योगदान: विनिर्माण उद्योग GDP में वृद्धि कर देश को आत्मनिर्भर बनाते हैं।
- 2. रोजगार के अवसर: उद्योगों से लाखों लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है।
- 3. कृषि पर निर्भरता में कमी: ग्रामीण जनसंख्या को वैकल्पिक रोजगार प्रदान कर कृषि पर दबाव घटाते हैं।
- 4. विदेशी मुद्रा अर्जन: औद्योगिक उत्पादों के निर्यात से विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
- 5. क्षेत्रीय संतुलित विकास: विभिन्न राज्यों में उद्योगों के प्रसार से संतुलित विकास संभव होता है।
- 6. आधारभूत ढाँचे का विकास: उद्योगों के विकास से परिवहन, संचार, बिजली, और बाजार का भी विस्तार होता है।
- 7. जीवन स्तर में सुधार: औद्योगिक वस्तुएँ सस्ती और सुलभ होने से जनजीवन का स्तर ऊँचा होता है।
भारत में विनिर्माण क्षेत्र का लक्ष्य 2025 तक GDP में 25% योगदान प्राप्त करना है — “मेक इन इंडिया” अभियान के माध्यम से।
उद्योगों का वर्गीकरण (Classification of Industries)
उद्योगों का वर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया जाता है। यह वर्गीकरण हमें यह समझने में मदद करता है कि किसी उद्योग का स्वरूप, उद्देश्य और उत्पादन प्रक्रिया कैसी है। भारत में उद्योगों को पाँच प्रमुख आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है —
- प्रयुक्त कच्चे माल के आधार पर
- प्रयुक्त भूमिका (उद्देश्य) के आधार पर
- पूँजी निवेश के आधार पर
- स्वामित्व के आधार पर
- कच्चे तथा तैयार माल के भार व मात्रा के आधार पर
1. प्रयुक्त कच्चे माल के आधार पर उद्योग
उद्योगों को उनके द्वारा उपयोग किए जाने वाले कच्चे माल के प्रकार के अनुसार दो मुख्य वर्गों में बाँटा जाता है:
| प्रकार | उदाहरण | मुख्य विशेषताएँ |
|---|---|---|
| (क) कृषि-आधारित उद्योग | कपड़ा, चीनी, वनस्पति तेल, कागज, जूट उद्योग | कच्चा माल कृषि से प्राप्त होता है। ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़ा होता है। |
| (ख) खनिज-आधारित उद्योग | लौह-इस्पात, सीमेंट, एल्यूमिनियम, पेट्रोलियम रिफाइनरी | खनिजों को कच्चे माल के रूप में उपयोग करते हैं। |
2. प्रयुक्त भूमिका (उद्देश्य) के आधार पर उद्योग
उद्योगों को उनके उत्पादन के उद्देश्य के अनुसार दो वर्गों में बाँटा जाता है:
| प्रकार | उदाहरण | विवरण |
|---|---|---|
| (क) मूल या प्राथमिक उद्योग | लौह-इस्पात, सीमेंट, कोयला उद्योग | ये अन्य उद्योगों के लिए कच्चा माल तैयार करते हैं। |
| (ख) उपभोक्ता या गौण उद्योग | कपड़ा, साइकिल, फर्नीचर, रेडीमेड वस्त्र | ये जनता की दैनिक आवश्यक वस्तुएँ बनाते हैं। |
3. पूँजी निवेश के आधार पर उद्योग
उद्योगों को पूँजी निवेश की मात्रा के अनुसार दो वर्गों में बाँटा जाता है:
| प्रकार | उदाहरण | मुख्य विशेषताएँ |
|---|---|---|
| (क) लघु उद्योग | हथकरघा, मोमबत्ती, फर्नीचर निर्माण | कम पूँजी निवेश, स्थानीय कच्चा माल, अधिक श्रम प्रधान। |
| (ख) भारी या बड़े उद्योग | लौह-इस्पात, ऑटोमोबाइल, सीमेंट | अधिक पूँजी निवेश, भारी मशीनरी और तकनीकी विशेषज्ञता। |
4. स्वामित्व के आधार पर उद्योग
उद्योगों को उनके स्वामित्व के अनुसार चार प्रकारों में बाँटा जाता है:
| प्रकार | उदाहरण | विवरण |
|---|---|---|
| (क) सार्वजनिक क्षेत्र | भेल, SAIL, एनटीपीसी | सरकार द्वारा स्वामित्व और संचालन। |
| (ख) निजी क्षेत्र | टाटा, रिलायंस, इंफोसिस | निजी व्यक्तियों या कंपनियों द्वारा स्वामित्व। |
| (ग) संयुक्त क्षेत्र | मराठी रसायन, भारत एल्युमिनियम | सरकार और निजी क्षेत्र दोनों का संयुक्त स्वामित्व। |
| (घ) सहकारी क्षेत्र | अमूल, इफको | सदस्यों द्वारा संचालित और लाभ साझा किया जाता है। |
5. कच्चे एवं तैयार माल के भार और मात्रा के आधार पर उद्योग
उद्योगों को उनके उत्पादन और कच्चे माल के भार के अनुसार दो प्रकारों में बाँटा जाता है:
| प्रकार | उदाहरण | विशेषताएँ |
|---|---|---|
| (क) भारी उद्योग | लौह-इस्पात, जहाज निर्माण, भारी मशीनरी | भारी कच्चा माल, विशाल संयंत्र, अधिक पूँजी की आवश्यकता। |
| (ख) हल्के उद्योग | कपड़ा, जूते, खिलौने, रेडीमेड वस्त्र | हल्का कच्चा माल, उपभोक्ता वस्तुएँ, श्रम प्रधान। |
भारत में उद्योगों का लगभग 75% भाग छोटे और मझोले स्तर के उद्योगों (MSMEs) से जुड़ा है, जो लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं।
कृषि आधारित उद्योग (Agro-based Industries)
परिचय:
कृषि आधारित उद्योग वे उद्योग हैं जो अपने कच्चे माल के लिए कृषि पर निर्भर रहते हैं। जैसे – कपास, गुड़, गन्ना, वनस्पति तेल, तंबाकू, चाय, कॉफी आदि उद्योग।
मुख्य कृषि आधारित उद्योग:
- वस्त्र उद्योग (Textile Industry)
- खाद्य प्रसंस्करण उद्योग (Food Processing Industry)
- चीनी उद्योग (Sugar Industry)
- वनस्पति तेल उद्योग (Vegetable Oil Industry)
- जूट उद्योग (Jute Industry)
- कागज उद्योग (Paper Industry)
वस्त्र उद्योग (Textile Industry)
भारत का वस्त्र उद्योग देश का सबसे बड़ा उद्योग है। यह सबसे अधिक रोजगार प्रदान करता है और विदेशी मुद्रा अर्जन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह उद्योग कपास, रेशम, ऊन, जूट और कृत्रिम रेशों पर आधारित है।
| प्रकार | मुख्य कच्चा माल | मुख्य उत्पादन क्षेत्र |
|---|---|---|
| सूती वस्त्र उद्योग | कपास | महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु |
| ऊन वस्त्र उद्योग | ऊन | राजस्थान, पंजाब, जम्मू |
| रेशम वस्त्र उद्योग | कोकून (रेशम कीट) | कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु |
| जूट वस्त्र उद्योग | जूट | पश्चिम बंगाल |
सूती वस्त्र उद्योग (Cotton Textile Industry)
परिचय:
सूती वस्त्र उद्योग भारत का सबसे पुराना और परंपरागत उद्योग है। इसे भारत की ‘औद्योगिक रीढ़’ कहा जाता है। इस उद्योग में कच्चे कपास से सूत और कपड़ा तैयार किया जाता है।
मुख्य विशेषताएँ:
- भारत में यह उद्योग मुख्य रूप से महाराष्ट्र (मुंबई), गुजरात (अहमदाबाद) और तमिलनाडु में केंद्रित है।
- इस उद्योग में घरेलू उत्पादन और हाथकरघा आधारित उद्योग दोनों शामिल हैं।
- भारत विश्व में तीसरा सबसे बड़ा सूती कपड़ा उत्पादक देश है।
समस्याएँ:
- पुरानी मशीनरी और कम उत्पादकता
- कच्चे कपास की गुणवत्ता में असमानता
- विद्युत की कमी और परिवहन की कठिनाइयाँ
- विदेशी प्रतिस्पर्धा से प्रभावित निर्यात
भारत के पहले आधुनिक सूती कपड़ा मिल की स्थापना 1854 में मुंबई (बॉम्बे) में की गई थी, जिसका नाम था — “बॉम्बे स्पिनिंग एंड वीविंग कंपनी”।
पटसन उद्योग (Jute Industry)
परिचय:
पटसन (Jute) एक प्राकृतिक रेशा है जो पटसन पौधे के तने से प्राप्त होता है। इससे बोरी, रस्सी, गालिचे, थैले और विभिन्न प्रकार के पैकिंग सामग्री बनाई जाती हैं। भारत का यह उद्योग कृषि आधारित उद्योग की श्रेणी में आता है।
मुख्य विशेषताएँ:
- भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा पटसन उत्पादक देश है (बांग्लादेश पहले स्थान पर)।
- पटसन उद्योग को “गोल्डन फाइबर इंडस्ट्री” भी कहा जाता है क्योंकि इसका रेशा सुनहरे रंग का होता है।
- इस उद्योग की स्थापना मुख्यतः कोलकाता (पश्चिम बंगाल) में की गई थी।
- भारत में यह उद्योग लगभग 25 लाख लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है।
| उत्पादन का प्रमुख राज्य | मुख्य उद्योग केंद्र | कच्चा माल उपलब्धता |
|---|---|---|
| पश्चिम बंगाल | हुगली, हावड़ा, 24 परगना, कोलकाता | गंगा नदी के डेल्टा क्षेत्र |
| बिहार | कटिहार, पूर्णिया | कोसी और गंडक नदी तटीय क्षेत्र |
| असम | गुवाहाटी | बराक नदी क्षेत्र |
पटसन उद्योग की समस्याएँ:
- कच्चे माल की गुणवत्ता में असमानता
- पुरानी मशीनें और कम उत्पादकता
- बांग्लादेश से प्रतिस्पर्धा
- कृत्रिम रेशों (नाइलॉन, पॉलिएस्टर) की बढ़ती मांग
समाधान:
- आधुनिक तकनीक और मशीनरी का प्रयोग
- पटसन मिश्रित उत्पादों का विकास
- विदेशी बाजारों में प्रचार और विविधीकरण
- किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज और प्रशिक्षण उपलब्ध कराना
भारत की पहली जूट मिल की स्थापना 1859 ई. में रिसरा (पश्चिम बंगाल) में की गई थी।
भारत के कुल पटसन उद्योगों में से लगभग 90% उद्योग हुगली नदी के किनारे स्थित हैं।
खनिज आधारित उद्योग (Mineral-Based Industries)
परिचय:
वे उद्योग जो अपने कच्चे माल के रूप में खनिजों का उपयोग करते हैं, उन्हें खनिज आधारित उद्योग कहा जाता है।
इन उद्योगों में विभिन्न धातुओं और खनिजों से उपयोगी वस्तुएँ बनाई जाती हैं।
मुख्य खनिज आधारित उद्योग:
- लौह एवं इस्पात उद्योग
- एल्यूमिनियम उद्योग
- ताँबा उद्योग
- सीमेंट उद्योग
- मशीन निर्माण उद्योग
महत्व:
- इन उद्योगों से भारी मशीनें, औजार और निर्माण सामग्री प्राप्त होती है।
- यह देश के औद्योगिक विकास की रीढ़ माने जाते हैं।
- इनसे अनेक सहायक उद्योगों का भी विकास होता है।
लोहा एवं इस्पात उद्योग (Iron and Steel Industry)
परिचय:
लोहा और इस्पात उद्योग को “आधुनिक उद्योगों की जननी” कहा जाता है क्योंकि लगभग सभी अन्य उद्योग इस पर निर्भर करते हैं।
इस उद्योग में लौह अयस्क, कोयला और चूना पत्थर प्रमुख कच्चे माल हैं।
मुख्य कच्चा माल:
- लौह अयस्क – झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़
- कोयला – झारखंड, पश्चिम बंगाल
- चूना पत्थर – मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़
| उद्योग केंद्र | राज्य | स्थापना वर्ष |
|---|---|---|
| टिस्को (TISCO) | जमशेदपुर (झारखंड) | 1907 |
| भिलाई इस्पात संयंत्र | छत्तीसगढ़ | 1959 |
| दुर्गापुर इस्पात संयंत्र | पश्चिम बंगाल | 1959 |
| राउरकेला इस्पात संयंत्र | उड़ीसा | 1959 |
| बोकारो इस्पात संयंत्र | झारखंड | 1964 |
महत्व:
- इस उद्योग से रेलवे, जहाज, वाहन, मशीनें और निर्माण सामग्री बनती हैं।
- यह भारी उद्योगों और आधारभूत ढाँचे के विकास में सहायक है।
- भारत विश्व के शीर्ष इस्पात उत्पादक देशों में से एक है।
समस्याएँ:
- पुरानी मशीनें और कम उत्पादकता
- ऊर्जा संकट और बिजली की कमी
- कच्चे माल की परिवहन लागत अधिक
- विदेशी प्रतिस्पर्धा और उच्च उत्पादन लागत
भारत का सबसे पुराना और प्रसिद्ध इस्पात संयंत्र टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) है,
जिसकी स्थापना 1907 में जमशेदपुर में जे. एन. टाटा द्वारा की गई थी।
यह आज भी भारत के इस्पात उद्योग का अग्रणी केंद्र है।
एल्यूमिनियम प्रगलन उद्योग (Aluminium Smelting Industry)
परिचय:
एल्यूमिनियम एक हल्की, टिकाऊ और जंग-प्रतिरोधी धातु है।
इसे बॉक्साइट अयस्क से प्रगलन (Smelting) प्रक्रिया द्वारा प्राप्त किया जाता है।
यह धातु आधुनिक उद्योगों में व्यापक रूप से उपयोग की जाती है, इसलिए इसे “आधुनिक युग की धातु” कहा जाता है।
कच्चा माल:
- मुख्य अयस्क – बॉक्साइट (Bauxite)
- सहायक तत्व – क्रायोलाइट, चूना पत्थर, सोडा ऐश
- ऊर्जा स्रोत – जलविद्युत या तापीय विद्युत (क्योंकि प्रगलन में अत्यधिक बिजली की आवश्यकता होती है)
प्रगलन की प्रक्रिया:
- बॉक्साइट को पहले परिशोधन (Refining) द्वारा शुद्ध एल्यूमिना (Al2O3) में बदला जाता है।
- फिर इसे विद्युत अपघटन (Electrolysis) द्वारा एल्यूमिनियम धातु में परिवर्तित किया जाता है।
- यह पूरी प्रक्रिया अत्यधिक बिजली की मांग करती है, इसलिए प्रगलन संयंत्र जलविद्युत केंद्रों के पास स्थापित किए जाते हैं।
| मुख्य उत्पादन क्षेत्र | राज्य | मुख्य संयंत्र |
|---|---|---|
| रेंगलिया | ओडिशा | NALCO (National Aluminium Company) |
| कोरबा | छत्तीसगढ़ | BALCO (Bharat Aluminium Company) |
| राँची | झारखंड | HINDALCO |
| मेट्टूर | तमिलनाडु | Madras Aluminium Company (MALCO) |
महत्व:
- एल्यूमिनियम का प्रयोग हवाई जहाज, ऑटोमोबाइल, रेल डिब्बों और विद्युत तारों में किया जाता है।
- यह स्टील की तुलना में तीन गुना हल्का लेकिन बहुत मजबूत होता है।
- यह धातु पुनर्चक्रण योग्य (Recyclable) है, जिससे ऊर्जा की बचत होती है।
समस्याएँ:
- प्रगलन में अत्यधिक विद्युत ऊर्जा की आवश्यकता
- परिवहन लागत अधिक
- कच्चे माल की गुणवत्ता में असमानता
- विदेशी तकनीक पर निर्भरता
भारत का पहला एल्यूमिनियम संयंत्र 1938 में जंगलमहल (पश्चिम बंगाल) में स्थापित हुआ था।
आज भारत विश्व के शीर्ष पाँच एल्यूमिनियम उत्पादक देशों में से एक है।
NALCO, BALCO, HINDALCO इस क्षेत्र की प्रमुख कंपनियाँ हैं।
रसायन उद्योग (Chemical Industry)
रसायन उद्योग भारत के प्रमुख उद्योगों में से एक है, जो कृषि, स्वास्थ्य, वस्त्र, पेपर, औषधि, और अनेक अन्य उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध कराता है। यह उद्योग देश की आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसे “औद्योगिक विकास की रीढ़” कहा जाता है।
मुख्य विशेषताएँ :
- रसायन उद्योग कच्चे तेल, खनिजों, गैस तथा पानी से विभिन्न प्रकार के रासायनिक पदार्थ तैयार करता है।
- यह भारी तथा हल्के दोनों प्रकार के रसायन बनाता है।
- भारत में रासायनिक उद्योग का विस्तार तेज़ी से हो रहा है, जिससे यह GDP में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
रसायनों के प्रमुख प्रकार :
| रसायन का प्रकार | उदाहरण | उपयोग |
|---|---|---|
| भारी रसायन | सल्फ्यूरिक अम्ल, नाइट्रिक अम्ल, सोडा ऐश, क्षार | उर्वरक, कपड़ा, साबुन, कागज, प्लास्टिक उद्योग में उपयोग |
| हल्के रसायन | सुगंध, औषधि, साबुन, डिटर्जेंट, प्रसाधन सामग्री | घरेलू उत्पादों और दवाओं के निर्माण में |
| जैव रसायन | कीटनाशक, फफूंदनाशी, उर्वरक | कृषि उत्पादन बढ़ाने में सहायक |
| पेट्रो-रसायन | प्लास्टिक, सिंथेटिक फाइबर, सिंथेटिक रबर | विभिन्न औद्योगिक वस्तुओं के निर्माण में |
मुख्य रासायनिक उद्योग केंद्र :
मुंबई, ठाणे, पुणे, अहमदाबाद, वडोदरा, दिल्ली, कानपुर, कोलकाता, चेन्नई और हाजीपुर जैसे शहरों में रासायनिक उद्योग केंद्रित हैं। गुजरात और महाराष्ट्र इस उद्योग के सबसे बड़े केंद्र हैं।
महत्व :
- अन्य उद्योगों को आवश्यक कच्चा माल उपलब्ध कराता है।
- निर्यात से विदेशी मुद्रा अर्जित होती है।
- रोजगार के अनेक अवसर पैदा करता है।
- कृषि और स्वास्थ्य क्षेत्र में योगदान देता है।
उर्वरक उद्योग (Fertilizer Industry)
भारत एक कृषि प्रधान देश है, इसलिए उर्वरक उद्योग का विशेष महत्व है। यह उद्योग कृषि भूमि की उर्वरता बनाए रखने और फसल उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उर्वरकों से मिट्टी को आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं, जिससे फसलों की पैदावार बढ़ती है।
मुख्य बिंदु :
- उर्वरक उद्योग कृषि क्षेत्र को आवश्यक रासायनिक पोषक तत्व उपलब्ध कराता है।
- भारत में यह उद्योग 1950 के दशक में तेजी से विकसित हुआ।
- देश में लगभग सभी प्रकार के रासायनिक उर्वरक उत्पादित किए जाते हैं।
उर्वरकों के प्रकार :
| उर्वरक का प्रकार | मुख्य तत्व | उदाहरण | उपयोग |
|---|---|---|---|
| नाइट्रोजन युक्त उर्वरक | नाइट्रोजन (N) | यूरिया, अमोनियम सल्फेट | फसलों की पत्तियों की वृद्धि और हरेपन के लिए |
| फॉस्फोरस युक्त उर्वरक | फॉस्फोरस (P) | सुपर फॉस्फेट, डीएपी (DAP) | जड़ों और फूलों की वृद्धि में सहायक |
| पोटाश युक्त उर्वरक | पोटेशियम (K) | पोटेशियम सल्फेट, म्यूरिएट ऑफ पोटाश | फलों की गुणवत्ता और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में |
| मिश्रित उर्वरक | N + P + K | NPK मिश्रण | समग्र फसल वृद्धि के लिए |
मुख्य उर्वरक उत्पादन केंद्र :
- गुजरात — हजीरा, कांडला, कलोल
- महाराष्ट्र — रायगढ़, नागपुर
- उत्तर प्रदेश — गोरखपुर, लखनऊ
- बिहार — हाजीपुर
- तमिलनाडु — तूतिकोरिन
- पश्चिम बंगाल — हल्दिया
महत्व :
- कृषि उत्पादन में वृद्धि करता है।
- किसानों की आय और जीवन स्तर सुधारता है।
- खाद्यान्न सुरक्षा में योगदान देता है।
- रोजगार और औद्योगिक विकास में सहायक है।
चुनौतियाँ :
- कच्चे माल की कमी
- आयात पर निर्भरता
- पर्यावरण प्रदूषण की समस्या
- मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट
सीमेंट उद्योग (Cement Industry)
सीमेंट उद्योग भारत के आधारभूत उद्योगों में से एक है। यह उद्योग निर्माण कार्यों जैसे भवन, बाँध, सड़क, पुल और अन्य ढाँचागत परियोजनाओं के लिए आवश्यक सामग्री प्रदान करता है। इस कारण इसे राष्ट्र निर्माण का स्तंभ कहा जाता है।
मुख्य बिंदु :
- भारत का सीमेंट उद्योग विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।
- यह उद्योग 1904 में तमिलनाडु के चेनई (मद्रास) में प्रारंभ हुआ था।
- आज भारत के लगभग सभी राज्यों में सीमेंट संयंत्र स्थापित हैं।
सीमेंट निर्माण के लिए आवश्यक कच्चे पदार्थ :
| क्रम | कच्चा पदार्थ | उपयोग |
|---|---|---|
| 1. | चूना पत्थर (Limestone) | मुख्य घटक – कैल्शियम प्रदान करता है |
| 2. | मिट्टी (Clay) | सिलिका, ऐल्युमिना और लौह प्रदान करती है |
| 3. | जिप्सम (Gypsum) | सख्त होने की गति नियंत्रित करता है |
| 4. | कोयला | ईंधन के रूप में उपयोग होता है |
मुख्य उत्पादन क्षेत्र :
- मध्य प्रदेश – सतना, कटनी, मैहर
- राजस्थान – चित्तौड़गढ़, कोटा, नागौर
- गुजरात – अहमदाबाद, राजकोट, सूरत
- तमिलनाडु – तिरुनेलवेली, मदुरै
- आंध्र प्रदेश – विजयवाड़ा, कडप्पा
- छत्तीसगढ़ – बिलासपुर, दुर्ग
महत्व :
- निर्माण कार्यों के लिए आवश्यक सामग्री प्रदान करता है।
- रोजगार के अवसर उत्पन्न करता है।
- विदेशी मुद्रा अर्जित करने में सहायक है।
- आधारभूत ढांचे के विकास में सहायक है।
समस्याएँ :
- ऊर्जा की अधिक खपत और कोयले की कमी।
- प्रदूषण की गंभीर समस्या।
- परिवहन लागत अधिक।
- कच्चे माल के स्रोत सीमित क्षेत्रों में केंद्रित।
क्या आप जानते हैं?
भारत के सीमेंट उद्योग में अंबुजा, एसीसी, अल्ट्राटेक, डालमिया, बिड़ला सीमेंट प्रमुख कंपनियाँ हैं। भारत प्रतिवर्ष लगभग 330 मिलियन टन सीमेंट का उत्पादन करता है।
मोटरगाड़ी उद्योग (Automobile Industry)
मोटरगाड़ी उद्योग भारत के सबसे आधुनिक और तकनीकी रूप से उन्नत उद्योगों में से एक है। यह उद्योग कार, मोटरसाइकिल, ट्रक, बस और इलेक्ट्रिक वाहन का निर्माण करता है।
यह न केवल देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देता है, बल्कि रोजगार के अवसर भी प्रदान करता है।
मुख्य विशेषताएँ :
- मोटरगाड़ी उद्योग तकनीकी रूप से उन्नत और पूंजी-प्रधान उद्योग है।
- इस उद्योग में कारखानों में बड़े पैमाने पर उत्पादन और संयंत्र स्वचालन का प्रयोग होता है।
- देश में यह उद्योग न केवल घरेलू मांग को पूरा करता है बल्कि निर्यात के लिए भी महत्वपूर्ण है।
मुख्य मोटरगाड़ी उत्पादन केंद्र :
| उद्योग केंद्र | राज्य | मुख्य कंपनियाँ |
|---|---|---|
| पुणे | महाराष्ट्र | टाटा मोटर्स, महिंद्रा, फ़ोर्ड |
| चेन्नई | तमिलनाडु | होंडा, ह्युंडई, रेनॉल्ट |
| गुरुग्राम | हरियाणा | मारुति सुजुकी, ह्युंडई |
| सियालदाह / कोलकाता | पश्चिम बंगाल | टाटा, फोर्ड |
उद्योग का महत्व :
- देश में आर्थिक विकास और औद्योगिक वृद्धि में योगदान।
- विशेष रूप से युवाओं के लिए रोजगार के अवसर प्रदान करता है।
- विदेशी मुद्रा अर्जित करने में सहायक।
- तकनीकी विकास और नवीनतम मशीनरी के प्रयोग को बढ़ावा देता है।
मुख्य समस्याएँ :
- कच्चे माल की लागत अधिक और आयात पर निर्भरता।
- ऊर्जा और तकनीकी मशीनरी पर खर्च अधिक।
- प्रदूषण और पर्यावरण संबंधी नियमों का पालन जरूरी।
- विदेशी प्रतिस्पर्धा और लागत नियंत्रण की चुनौती।
क्या आप जानते हैं?
भारत में मारुति सुजुकी, टाटा, महिंद्रा, होंडा, हुंडई जैसी कंपनियाँ मोटरगाड़ी उद्योग को आगे बढ़ा रही हैं।
भारत विश्व के 5 सबसे बड़े मोटरगाड़ी उत्पादक देशों में शामिल है।
पुणे और चेन्नई देश के प्रमुख ऑटोमोबाइल केंद्र माने जाते हैं।
सूचना प्रौद्योगिकी एवं इलेक्ट्रॉनिक उद्योग (IT & Electronics Industry)
सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक उद्योग भारत के आधुनिक और तेजी से विकसित हो रहे उद्योग हैं।
ये उद्योग कंप्यूटर, सॉफ्टवेयर, मोबाइल, संचार उपकरण, माइक्रोचिप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उत्पादन करते हैं।
देश की आर्थिक वृद्धि, डिजिटलरण और तकनीकी विकास में इनका अत्यधिक योगदान है।
मुख्य विशेषताएँ :
- IT उद्योग सॉफ्टवेयर विकास, IT सेवाओं, क्लाउड कंप्यूटिंग और आउटसोर्सिंग में अग्रणी है।
- इलेक्ट्रॉनिक उद्योग कंप्यूटर, स्मार्टफोन, टीवी, राडियो, सेमीकंडक्टर और अन्य उपकरणों का निर्माण करता है।
- यह उद्योग उच्च तकनीकी ज्ञान और कुशल मानव संसाधन पर निर्भर करता है।
- भारत की निर्यात क्षमता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में योगदान।
मुख्य उत्पादन केंद्र :
| उद्योग केंद्र | राज्य / शहर | मुख्य उत्पाद / सेवाएँ |
|---|---|---|
| बेंगलुरु | कर्नाटक | सॉफ्टवेयर, IT सेवाएँ, स्टार्टअप हब |
| हैदराबाद | तेलंगाना | सॉफ्टवेयर, ITES, डेटा सेंटर |
| गुड़गाँव / नोएडा | हरियाणा / उत्तर प्रदेश | IT आउटसोर्सिंग, कस्टमर केयर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण |
| चेन्नई | तमिलनाडु | इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, सॉफ्टवेयर, ऑटो IT |
| पुणे | महाराष्ट्र | इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, कंप्यूटर हार्डवेयर |
महत्व :
- देश की डिजिटल और तकनीकी प्रगति में योगदान।
- रोजगार के उच्च मूल्य वाले अवसर प्रदान करता है।
- विदेशी मुद्रा अर्जित करने में सहायक।
- अन्य उद्योगों के उत्पादन और प्रबंधन को सशक्त बनाता है।
मुख्य समस्याएँ :
- उच्च तकनीकी ज्ञान और प्रशिक्षित मानव संसाधन की आवश्यकता।
- विदेशी तकनीक और कच्चे माल पर निर्भरता।
- उद्योगों में तेजी से बदलती तकनीक के अनुसार अद्यतन की आवश्यकता।
- विदेशी प्रतिस्पर्धा और मूल्य निर्धारण की चुनौती।
क्या आप जानते हैं?
भारत को “दुनिया का IT हब” भी कहा जाता है।
बेंगलुरु को “सिलिकॉन वैली ऑफ इंडिया” कहा जाता है।
देश की प्रमुख IT कंपनियाँ: TCS, Infosys, Wipro, HCL।
इलेक्ट्रॉनिक उपकरण कंपनियाँ: Samsung, LG, Dell, Micromax।
औद्योगिक प्रदूषण और पर्यावरणीय नियंत्रण
औद्योगिकीकरण ने आर्थिक विकास में योगदान दिया है, लेकिन इसके साथ ही पर्यावरण प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन भी बढ़ा है।
औद्योगिक गतिविधियाँ जल, वायु, मृदा और ध्वनि प्रदूषण का मुख्य स्रोत बन गई हैं।
इसलिए पर्यावरणीय संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण अत्यंत आवश्यक हैं।
औद्योगिक प्रदूषण के प्रकार :
- वायु प्रदूषण : कारखानों से निकलने वाले धुआँ, धूल, गैसें जैसे SO2, CO2, NOx वातावरण में मिलकर वायु प्रदूषण उत्पन्न करते हैं।
- जल प्रदूषण : उद्योगों से निकली रासायनिक अपशिष्ट जल स्रोतों में मिलकर जल प्रदूषण उत्पन्न करता है।
- मृदा प्रदूषण : हानिकारक रसायन, धातु अपशिष्ट और प्लास्टिक कचरा मिट्टी की गुणवत्ता घटाते हैं।
- ध्वनि प्रदूषण : भारी मशीनरी, वाहनों और उद्योगों के शोर से ध्वनि प्रदूषण होता है।
प्रदूषण के परिणाम :
- स्वास्थ्य समस्याएँ: श्वसन, हृदय रोग, त्वचा रोग आदि।
- जैव विविधता में कमी और पारिस्थितिकी तंत्र का असंतुलन।
- कृषि और जल स्रोतों की गुणवत्ता में गिरावट।
- जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग में योगदान।
पर्यावरण संरक्षण के उपाय :
| उपाय | विवरण |
|---|---|
| उद्योगों में अपशिष्ट जल उपचार | सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और रासायनिक अपशिष्ट का उपचार |
| वायु प्रदूषण नियंत्रण | फिल्टर, साइक्लोन, धुआँ शोधन उपकरण और ग्रीन बेल्ट बनाना |
| मृदा संरक्षण | कचरा प्रबंधन, रीसाइक्लिंग और जैव अपशिष्ट का उपयोग |
| नवीकरणीय ऊर्जा का प्रयोग | सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जलविद्युत का अधिकतम उपयोग |
| कानूनी नियंत्रण | औद्योगिक प्रदूषण रोकने हेतु पर्यावरण कानून और मानक लागू करना |
क्या आप जानते हैं?
भारत में वायु प्रदूषण (Air Act 1981) और जल प्रदूषण (Water Act 1974) जैसे कानून उद्योगों के लिए अनिवार्य हैं।
औद्योगिक प्रदूषण को कम करने के लिए इको-फ्रेंडली तकनीक, रीसाइक्लिंग और ग्रीन एनर्जी का उपयोग बढ़ाया जा रहा है।
वायु प्रदूषण (Air Pollution)
वायु प्रदूषण का अर्थ है वातावरण में हानिकारक गैसों, धूल और रासायनिक कणों का मिलना, जिससे वायु की गुणवत्ता घटती है और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
यह प्रदूषण मुख्य रूप से औद्योगिक गतिविधियों, वाहनों, ऊर्जा उत्पादन और प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न होता है।
वायु प्रदूषण के मुख्य स्रोत :
- औद्योगिक उत्सर्जन : कारखानों से निकलने वाला धुआँ और रासायनिक गैसें (SO2, NOx, CO2)।
- वाहन उत्सर्जन : पेट्रोल और डीजल इंजन से निकलने वाली हानिकारक गैसें।
- कृषि और घरों से धुआँ : पराली जलाना, कूड़ा जलाना, रसोई गैस का धुआँ।
- प्राकृतिक स्रोत : ज्वालामुखी, धूल भरे तूफान, जंगल की आग।
वायु प्रदूषण के प्रभाव :
- स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव: अस्थमा, फेफड़ों और हृदय रोग।
- जलवायु परिवर्तन और ग्रीनहाउस प्रभाव में वृद्धि।
- वनस्पति और कृषि उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव।
- स्मॉग और अम्लीय वर्षा जैसी प्राकृतिक समस्याएँ।
वायु प्रदूषण को कम करने के उपाय :
| उपाय | विवरण |
|---|---|
| वाहन उत्सर्जन नियंत्रण | इलेक्ट्रिक वाहन, सार्वजनिक परिवहन, पॉल्यूशन नॉर्म्स का पालन |
| औद्योगिक धुआँ नियंत्रण | फिल्टर, साइक्लोन, वायु शोधन तकनीक का प्रयोग |
| हरी पट्टी और पेड़ लगाना | वन और ग्रीन बेल्ट वायु शुद्धि में सहायक |
| स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग | सौर, पवन और जलविद्युत ऊर्जा का अधिकतम उपयोग |
| कानूनी उपाय | वायु प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम, प्रदूषण बोर्ड द्वारा निगरानी |
क्या आप जानते हैं?
भारत में वायु (प्रदूषण) नियंत्रण अधिनियम 1981 लागू है।
स्मॉग और अम्लीय वर्षा से बचाव के लिए उद्योग और शहरों में ग्रीन बेल्ट और उद्योगों के धुआँ शोधन उपकरण अनिवार्य हैं।
जल प्रदूषण (Water Pollution)
जल प्रदूषण तब होता है जब नदियाँ, झीलें, समुद्र या अन्य जल स्रोत हानिकारक रसायन, अपशिष्ट और जीवाणुओं से दूषित हो जाते हैं।
इससे न केवल पानी की गुणवत्ता घटती है, बल्कि मानव, पशु और पौधों के जीवन पर भी गंभीर प्रभाव पड़ता है।
जल प्रदूषण के मुख्य स्रोत :
- औद्योगिक अपशिष्ट : कारखानों से निकलने वाला रासायनिक अपशिष्ट, तेल, रंग और धातु यौगिक।
- घरेलू अपशिष्ट : नालियों का untreated पानी, रसोई और शौचालय का अपशिष्ट।
- कृषि अपशिष्ट : कीटनाशक, उर्वरक और पशु मल का जल स्रोतों में मिलना।
- प्राकृतिक कारण : भूमि कटाव, कीटाणु और मृदा के साथ बहते पोषक तत्व।
जल प्रदूषण के प्रभाव :
- स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव: दस्त, हैजा, टायफाइड, हृदय और यकृत रोग।
- मछली और अन्य जलीय जीवों की मृत्यु और जैव विविधता में कमी।
- पीने और सिंचाई के जल स्रोतों की गुणवत्ता घटाना।
- समुद्र और नदियों में मृदा और पोषक तत्वों का असंतुलन।
जल प्रदूषण को कम करने के उपाय :
| उपाय | विवरण |
|---|---|
| औद्योगिक अपशिष्ट उपचार | सफाई संयंत्र (Effluent Treatment Plant) द्वारा रासायनिक अपशिष्ट को सुरक्षित बनाना |
| घरेलू अपशिष्ट नियंत्रण | नालियों का ट्रीटमेंट और जैव अपशिष्ट का सही निपटान |
| कृषि रसायन नियंत्रण | उर्वरक और कीटनाशक का संतुलित उपयोग और जैविक विकल्प अपनाना |
| वन और वाटरशेड संरक्षण | नदी, तालाब और जल स्रोतों के आसपास वृक्षारोपण और संरक्षण |
| कानूनी उपाय | जल प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम, 1974 के तहत निगरानी और दंड |
क्या आप जानते हैं?
भारत में जल प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम, 1974 लागू है।
नदियों और जल स्रोतों को सुरक्षित रखने के लिए effluent treatment plants, recycling, और ग्रीन बेल्ट अनिवार्य किए गए हैं।
तापीय प्रदूषण (Thermal Pollution)
तापीय प्रदूषण तब होता है जब उद्योग, विद्युत संयंत्र या मशीनरी जल स्रोतों में अत्यधिक गर्म पानी छोड़ते हैं।
इससे जल का तापमान बढ़ जाता है और जल जीवों के लिए पर्यावरण असंतुलित हो जाता है।
यह प्रदूषण मुख्य रूप से बिजली उत्पादन, स्टील, सीमेंट और औद्योगिक संयंत्रों से उत्पन्न होता है।
तापीय प्रदूषण के मुख्य स्रोत :
- विद्युत उत्पादन संयंत्र : थर्मल पावर प्लांट में उपयोग होने वाला गर्म जल नदियों में छोड़ा जाता है।
- औद्योगिक कारखाने : स्टील, सीमेंट, कागज और रासायनिक उद्योगों से गर्म जल अपशिष्ट।
- नाभिकीय संयंत्र : जल शीतलन के बाद गर्म पानी का उत्सर्जन।
तापीय प्रदूषण के प्रभाव :
- जल का ऑक्सीजन स्तर घट जाता है, जिससे मछलियाँ और जलीय जीव मर सकते हैं।
- जलीय जीवों का जीवन चक्र और प्रजनन प्रभावित होता है।
- जलीय पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो जाता है।
- समुद्री और नदी जल के तापमान में वृद्धि से जैव विविधता पर नकारात्मक असर।
तापीय प्रदूषण को कम करने के उपाय :
| उपाय | विवरण |
|---|---|
| कूलिंग टावर का उपयोग | उद्योग और पावर प्लांट में गर्म जल को ठंडा करने के लिए |
| रिसाइक्लिंग और रीयूज़ | उद्योग में उपयोग होने वाले गर्म पानी को पुनः उपयोग करना |
| ग्रीन बेल्ट और पेड़ लगाना | जल स्रोतों के आसपास छाया और तापमान नियंत्रण के लिए |
| तापमान निगरानी | नदी और जल स्रोतों में जल का तापमान नियंत्रित करना |
क्या आप जानते हैं?
थर्मल पावर प्लांट द्वारा छोड़ा गया गर्म जल न केवल मछलियों के जीवन को प्रभावित करता है बल्कि नदी और झीलों में एल्गी वृद्धि (Algal Bloom) का कारण बनता है।
इसलिए तापीय प्रदूषण नियंत्रण उद्योगों के लिए अनिवार्य है।
ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution)
ध्वनि प्रदूषण तब होता है जब वातावरण में हानिकारक या अत्यधिक तीव्र ध्वनि का स्तर सामान्य सीमा से अधिक हो जाता है।
यह मानव स्वास्थ्य, जीव-जंतु और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
शहरी क्षेत्रों में यह प्रदूषण सबसे अधिक होता है।
ध्वनि प्रदूषण के मुख्य स्रोत :
- वाहन और ट्रैफिक : शहरों में भारी वाहन, हॉर्न और ट्रैफिक शोर।
- औद्योगिक मशीनरी : कारखानों की मशीनें और उपकरण।
- सामाजिक और मनोरंजन गतिविधियाँ : शादी समारोह, धार्मिक उत्सव, होली-दीपावली के पटाखे, संगीत कार्यक्रम।
- विमान और रेलवे : हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशन के पास उच्च ध्वनि स्तर।
ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव :
- मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव: सुनने की क्षमता में कमी, तनाव, नींद में कमी, हृदय रोग।
- पशु और पक्षियों के जीवन चक्र में व्यवधान।
- शहरों और वातावरण में असुविधा और मानसिक तनाव।
- सामाजिक और आर्थिक नुकसान: कार्य क्षमता में कमी और दुर्घटनाओं का खतरा।
ध्वनि प्रदूषण को कम करने के उपाय :
| उपाय | विवरण |
|---|---|
| वाहन शोर नियंत्रण | ध्वनि नियंत्रित हॉर्न, इलेक्ट्रिक वाहन, ट्रैफिक नियमों का पालन |
| औद्योगिक ध्वनि नियंत्रण | मशीनों में शोर अवशोषक उपकरण और ग्रीन बेल्ट बनाना |
| सामाजिक जागरूकता | ध्वनि स्तर सीमित करने के लिए अभियान और नियमों का पालन |
| आवासीय क्षेत्रों में नियमन | हाईवे, इंडस्ट्री और हवाई मार्गों से दूरी बनाए रखना |
क्या आप जानते हैं?
भारत में ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution) नियम 2000 लागू है।
शहरों में ध्वनि स्तर 55 dB (दिन में) और 45 dB (रात में) से अधिक नहीं होना चाहिए।
यह नियम अस्पताल, विद्यालय और आवासीय क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए लागू किया गया है।
पर्यावरणीय निम्नीकरण की रोकथाम (Prevention of Environmental Degradation)
पर्यावरणीय निम्नीकरण तब होता है जब मानव गतिविधियों और औद्योगिकीकरण के कारण प्राकृतिक संसाधनों की गुणवत्ता और जैव विविधता प्रभावित होती है।
इसके परिणामस्वरूप जल, वायु, मृदा, वन और जलीय जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
इसलिए पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण आवश्यक हैं।
प्रमुख उपाय :
- वृक्षारोपण : वनों की कटाई रोकना और अधिक पेड़ लगाना, ग्रीन बेल्ट बनाना।
- नवीकरणीय ऊर्जा का प्रयोग : सौर, पवन और जल विद्युत ऊर्जा का अधिकतम उपयोग।
- औद्योगिक अपशिष्ट नियंत्रण : Effluent Treatment Plants, धुआँ शोधन और रिसाइक्लिंग अपनाना।
- कचरा प्रबंधन : जैव अपशिष्ट का सही निपटान, प्लास्टिक कम उपयोग करना।
- सार्वजनिक जागरूकता : प्रदूषण और पर्यावरण सुरक्षा के लिए शिक्षा और अभियान।
- कानूनी नियंत्रण : पर्यावरण अधिनियम, जल और वायु प्रदूषण नियंत्रण कानूनों का पालन।
स्वयं के स्तर पर उपाय :
- पानी बचाना और प्रदूषण को रोकने के लिए घरेलू अपशिष्ट का सही निपटान।
- सवारी में सार्वजनिक परिवहन और इलेक्ट्रिक वाहन का प्रयोग।
- ऊर्जा बचाने के लिए ऊर्जा कुशल उपकरणों का उपयोग।
- स्थानीय स्तर पर सफाई अभियान और वृक्षारोपण में भाग लेना।
क्या आप जानते हैं?
भारत में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 लागू है।
इसके अंतर्गत जल, वायु, मृदा और वन संरक्षण के लिए उद्योगों और नागरिकों के लिए दिशानिर्देश निर्धारित हैं।
सतत विकास (Sustainable Development) का लक्ष्य केवल आर्थिक वृद्धि नहीं बल्कि पर्यावरणीय संतुलन भी सुनिश्चित करना है।
राष्ट्रीय ताप विद्युतग्रह (NTPC) द्वारा प्रदर्शित मार्ग
राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (NTPC) भारत की सबसे बड़ी थर्मल पावर और ऊर्जा उत्पादन कंपनी है।
NTPC ने सतत और पर्यावरण-संरक्षित ऊर्जा उत्पादन के लिए मार्गदर्शन और रणनीति विकसित की है।
इस मार्ग के प्रमुख तत्व पर्यावरणीय सुरक्षा, प्रदूषण नियंत्रण और कुशल ऊर्जा उत्पादन हैं।
NTPC द्वारा दिखाए गए मुख्य मार्ग :
- पर्यावरणीय अनुकूल ऊर्जा : उच्च कुशल थर्मल पावर प्लांट और कम कार्बन उत्सर्जन।
- नवीकरणीय ऊर्जा का प्रयोग : सौर और पवन ऊर्जा संयंत्रों का विकास।
- ऊर्जा दक्षता : उन्नत तकनीक और संयंत्रों में ऊर्जा की बचत।
- प्रदूषण नियंत्रण उपाय : धुआँ शोधन उपकरण, कूलिंग टावर और effluent treatment plant।
- सामाजिक और जैविक संरक्षण : ग्रीन बेल्ट, जल स्रोतों की सुरक्षा, और स्थानीय समुदायों के लिए योजनाएँ।
महत्व :
- देश में ऊर्जा की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करना।
- पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना और प्रदूषण घटाना।
- सतत विकास और आर्थिक प्रगति के लिए मार्गदर्शन।
- औद्योगिक और घरेलू उपयोग के लिए ऊर्जा सुरक्षा।
क्या आप जानते हैं?
NTPC ने अपने संयंत्रों में उच्च कुशल थर्मल तकनीक, धुआँ और जल शोधन उपकरण स्थापित किए हैं।
साथ ही, यह सौर और पवन ऊर्जा में निवेश करके भारत को हरित और सतत ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ा रहा है।
1. बहुवैकल्पिक प्रश्न (Multiple Choice Questions)
(i) निम्न में से कौन-सा उद्योग चूना पत्थर को कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त करता है?
- (क) एल्यूमिनियम
- (ख) प्लास्टिक
- (ग) सीमेंट ✅
- (घ) मोटरगाड़ी
(ii) निम्न में से कौन-सा उद्योग बॉक्साइट को कच्चे माल के रूप में प्रयोग करता है?
- (क) एल्यूमिनियम प्रगलन ✅
- (ख) सीमेंट
- (ग) कागज
- (घ) स्टील
(iii) निम्न में से कौन-सा उद्योग दूरभाष, कंप्यूटर आदि संयंत्र निर्मित करता है?
- (क) स्टील
- (ख) एल्यूमिनियम प्रगलन
- (ग) इलैक्ट्रानिक ✅
- (घ) सूचना प्रौद्योगिकी
2. छोटे उत्तर (30 शब्दों में)
(i) विनिर्माण क्या है?
विनिर्माण वह प्रक्रिया है जिसमें कच्चे माल को मशीनों, श्रम और तकनीक द्वारा तैयार उत्पादों में बदलकर उपभोक्ता उपयोग के योग्य बनाया जाता है।
(ii) आधारभूत उद्योग क्या है? उदाहरण देकर बताएँ।
आधारभूत उद्योग वे उद्योग हैं जो अन्य उद्योगों के लिए कच्चा माल, ऊर्जा और सेवाएँ उपलब्ध कराते हैं।
उदाहरण: इस्पात उद्योग, बिजली उत्पादन, कोयला उद्योग।
विस्तृत उत्तर (120 शब्द)
(i) उद्योग पर्यावरण को कैसे प्रदूषित करते हैं?
औद्योगिक गतिविधियाँ पर्यावरण को कई प्रकार से प्रदूषित करती हैं।
कारखानों से निकलने वाला धुआँ वायु में हानिकारक गैसें छोड़ता है।
औद्योगिक अपशिष्ट जल स्रोतों में मिलकर जल प्रदूषण उत्पन्न करते हैं।
कचरा और रासायनिक पदार्थ मृदा को दूषित करते हैं।
थर्मल पावर प्लांट और भारी मशीनरी द्वारा गर्म जल छोड़ा जाना जल तापमान बढ़ाकर तापीय प्रदूषण पैदा करता है।
ध्वनि प्रदूषण औद्योगिक मशीनरी और वाहनों से बढ़ता है।
इस प्रकार उद्योगों का असंतुलित संचालन वायु, जल, मृदा और ध्वनि पर नकारात्मक प्रभाव डालता है और जैव विविधता को खतरे में डालता है।
(ii) उद्योगों द्वारा पर्यावरण निम्नीकरण को कम करने के लिए उठाए गए उपाय
उद्योग पर्यावरणीय प्रदूषण और निम्नीकरण को कम करने के लिए कई उपाय अपनाते हैं।
धुआँ और कचरा रोकने के लिए फिल्टर, साइक्लोन और इफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट का उपयोग किया जाता है।
कूलिंग टावर और रिसाइक्लिंग तकनीक से तापीय प्रदूषण कम किया जाता है।
ग्रीन बेल्ट और पेड़ लगाने से वायु शुद्ध होती है और ध्वनि कम होती है।
सौर, पवन और जल विद्युत जैसी स्वच्छ ऊर्जा का प्रयोग बढ़ाया जाता है।
कानूनी दिशा-निर्देशों और पर्यावरण अधिनियमों का पालन अनिवार्य किया जाता है।
इस तरह उद्योग सतत विकास और पर्यावरण सुरक्षा दोनों सुनिश्चित करते हैं।
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