कक्षा 9: अध्याय 15 : खाद्य उत्पादन में सुधार (Improvement in Food Resources)

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अध्याय 15 : खाद्य उत्पादन में सुधार (Improvement in Food Resources)

परिचय : बढ़ती हुई जनसंख्या की आवश्यकता को पूरा करने के लिए हमें अधिक मात्रा में और बेहतर गुणवत्ता का भोजन उत्पादन करना आवश्यक है। इसलिए कृषि, पशुपालन और मत्स्य पालन के क्षेत्रों में वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करके खाद्य उत्पादन को बढ़ाने के प्रयास किए गए हैं।

क्या आप जानते हैं?
भारत में कृषि लगभग 70% जनसंख्या का प्रमुख व्यवसाय है और यह देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है।

कृषि सुधार की आवश्यकता

खाद्य उत्पादन में सुधार की आवश्यकता निम्न कारणों से पड़ी:

  • जनसंख्या में तीव्र वृद्धि
  • सीमित कृषि योग्य भूमि
  • प्राकृतिक संसाधनों की कमी
  • बढ़ती खाद्य मांग और पोषण की आवश्यकता

खाद्य उत्पादन सुधार के प्रमुख क्षेत्र

खाद्य उत्पादन में सुधार को मुख्यतः तीन क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है:

क्षेत्र मुख्य उद्देश्य
कृषि (Agriculture) फसलों का अधिक उत्पादन एवं गुणवत्ता सुधार
पशुपालन (Animal Husbandry) दूध, मांस, ऊन आदि उत्पादों की मात्रा व गुणवत्ता में सुधार
मत्स्य पालन (Fishery) जल उत्पादों की मात्रा में वृद्धि
महत्वपूर्ण तथ्य:
भारत में हरित क्रांति (Green Revolution) के बाद गेहूँ और धान के उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हुई। इसका श्रेय वैज्ञानिक तकनीकों और उच्च उत्पादक किस्मों को जाता है।

फसल उत्पादन में उन्नति (Improvement in Crop Production)

कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी प्रगति के कारण फसलों के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
फसल उत्पादन में उन्नति का उद्देश्य अधिक उपज प्राप्त करना, उत्पादन लागत घटाना और फसलों की गुणवत्ता बढ़ाना है।

क्या आप जानते हैं?
भारत विश्व में खाद्यान्न उत्पादन में अग्रणी देशों में से एक है। हरित क्रांति (Green Revolution) ने फसलों के उत्पादन को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया।

फसल उत्पादन में सुधार के तीन प्रमुख उपाय

क्षेत्र मुख्य उद्देश्य
फसल सुधार (Crop Improvement) अधिक उत्पादन देने वाली, रोग-प्रतिरोधी और अनुकूलित किस्मों का विकास
फसल उत्पादन प्रबंधन (Crop Production Management) उर्वरक, सिंचाई और कृषि तकनीकों के उचित प्रयोग द्वारा उपज बढ़ाना
फसल संरक्षण प्रबंधन (Crop Protection Management) फसलों को कीटों, रोगों और खरपतवारों से बचाना

फसल सुधार (Crop Improvement)

इसका उद्देश्य फसलों की नई और बेहतर किस्मों का विकास करना है, जो अधिक उपज देने वाली, कीटों व रोगों के प्रति प्रतिरोधी तथा भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल हों।

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महत्वपूर्ण तथ्य:
फसलों की नई किस्में विकसित करने के लिए संकरण (Hybridisation) और कृत्रिम चयन (Artificial Selection) जैसी विधियों का उपयोग किया जाता है।

फसल सुधार के प्रमुख उद्देश्य:

  • अधिक उत्पादन प्राप्त करना
  • रोगों एवं कीटों के प्रति प्रतिरोधकता बढ़ाना
  • अनुकूल जलवायु परिस्थितियों में वृद्धि करना
  • भोजन की गुणवत्ता सुधारना (जैसे प्रोटीन, विटामिन आदि की मात्रा बढ़ाना)

फसल उत्पादन प्रबंधन (Crop Production Management)

फसल उत्पादन प्रबंधन में उर्वरक, सिंचाई, मिट्टी की तैयारी और बीज बोने के वैज्ञानिक तरीकों को अपनाया जाता है।
यह तीन स्तरों पर किया जा सकता है:

स्तर विशेषताएँ
निम्न स्तर की कृषि पारंपरिक तरीके, पशु शक्ति और प्राकृतिक उर्वरक का उपयोग
मध्यम स्तर की कृषि कृषि उपकरणों और रासायनिक उर्वरकों का सीमित उपयोग
उच्च स्तर की कृषि आधुनिक मशीनरी, उन्नत बीज, कीटनाशक और वैज्ञानिक सिंचाई का प्रयोग

फसल संरक्षण प्रबंधन (Crop Protection Management)

फसलें अनेक प्रकार के कीटों, रोगों, जीवाणुओं और खरपतवारों से प्रभावित होती हैं। इनसे फसलों को बचाने के लिए विभिन्न जैविक और रासायनिक उपाय किए जाते हैं।

  • कीटों को नियंत्रित करने के लिए कीटनाशी (Insecticides) का प्रयोग
  • रोगों से बचाव के लिए फफूंदनाशी (Fungicides)
  • खरपतवार नियंत्रण के लिए खरपतवारनाशी (Weedicides)
  • प्राकृतिक नियंत्रण के लिए जैव नियंत्रण (Biological Control) पद्धति

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उदाहरण:
कपास की फसल में कीट नियंत्रण के लिए Bt Cotton नामक जैविक संशोधित फसल विकसित की गई है, जो स्वंय कीटरोधी होती है।

अनाज, दालें, फल एवं सब्जियों से हमें क्या प्राप्त होता है?

हमारा भोजन विभिन्न प्रकार की वस्तुओं से मिलकर बनता है जैसे — अनाज, दालें, फल, सब्जियाँ, दूध, मांस आदि।
इन सबका शरीर में अलग-अलग कार्य होता है और ये हमें विभिन्न पोषक तत्व (Nutrients) प्रदान करते हैं, जो शरीर की वृद्धि, ऊर्जा और मरम्मत के लिए आवश्यक हैं।

क्या आप जानते हैं?
शरीर को स्वस्थ रखने के लिए भोजन में सभी प्रकार के पोषक तत्वों का संतुलित मात्रा में होना आवश्यक है। ऐसा भोजन संतुलित आहार (Balanced Diet) कहलाता है।

मुख्य खाद्य पदार्थ और उनसे मिलने वाले पोषक तत्व

खाद्य पदार्थ मुख्य पोषक तत्व मुख्य कार्य
अनाज (जैसे गेहूँ, चावल, मक्का, जौ) कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates) शरीर को ऊर्जा प्रदान करना
दालें (जैसे मूँग, अरहर, मसूर, चना) प्रोटीन (Proteins) शरीर की वृद्धि और ऊतकों की मरम्मत
फल (जैसे सेब, केला, अमरूद, संतरा) विटामिन और खनिज लवण (Vitamins & Minerals) रोगों से बचाव और शरीर के कार्यों का नियमन
सब्जियाँ (जैसे पालक, गाजर, टमाटर, फूलगोभी) विटामिन, खनिज लवण और रेशा (Fibre) पाचन क्रिया में सहायता और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना
तेल एवं घी वसा (Fats) ऊर्जा का संचित स्रोत और शरीर की ऊष्मा बनाए रखना
महत्वपूर्ण तथ्य:
सिर्फ अनाज खाने से शरीर को पर्याप्त प्रोटीन, विटामिन और खनिज नहीं मिलते।
इसलिए भोजन में दालें, फल और सब्जियाँ भी शामिल करनी चाहिए ताकि आहार संतुलित रहे।

निष्कर्ष :

अनाज हमें ऊर्जा देते हैं, दालें प्रोटीन का स्रोत हैं, जबकि फल एवं सब्जियाँ विटामिन और खनिज लवण प्रदान करती हैं।
इन सबका संतुलित सेवन ही शरीर को स्वस्थ और रोगमुक्त रखता है।

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फसल की किस्मों में सुधार (Improvement in Crop Varieties)

फसलों की किस्मों में सुधार का अर्थ है — ऐसी नई प्रजातियों का विकास करना जो अधिक उपज दें, रोगों एवं कीटों के प्रति प्रतिरोधक हों, तथा भिन्न-भिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में भी अच्छी तरह बढ़ सकें।
फसल सुधार विज्ञान का उद्देश्य किसान की आय बढ़ाना और खाद्य उत्पादन को स्थायी बनाना है।

क्या आप जानते हैं?
भारत में हरित क्रांति (Green Revolution) के दौरान उच्च उपज देने वाली किस्में (HYV – High Yielding Varieties) जैसे – IR-8 (धान) और Kalyan Sona (गेहूँ) विकसित की गई थीं।

फसल सुधार के मुख्य उद्देश्य

  • फसलों की उपज क्षमता में वृद्धि करना
  • रोगों और कीटों के प्रति प्रतिरोधकता बढ़ाना
  • विभिन्न जलवायु और मिट्टी परिस्थितियों के अनुरूप फसलें तैयार करना
  • भोजन की गुणवत्ता बढ़ाना (जैसे प्रोटीन, तेल या विटामिन की मात्रा)
  • फसल की अवधि घटाना ताकि एक वर्ष में अधिक फसलें ली जा सकें

फसल सुधार की विधियाँ (Methods of Crop Improvement)

विधि विवरण
संकरण (Hybridisation) दो भिन्न किस्मों को पार करके ऐसी नई किस्म तैयार की जाती है, जिसमें दोनों के गुण मौजूद हों। उदाहरण: गेहूँ की किस्म ‘सोनालिका’
कृत्रिम चयन (Artificial Selection) किसान या वैज्ञानिक द्वारा वांछित गुणों वाली पौधों का चयन करके नई पीढ़ी तैयार करना।
आनुवंशिक अभियांत्रिकी (Genetic Engineering) डीएनए स्तर पर जीनों में परिवर्तन करके रोगरोधी या अधिक उत्पादक फसलें बनाना। उदाहरण: Bt Cotton
संकर शक्ति (Hybrid Vigour) दो विभिन्न प्रजातियों के संकरण से प्राप्त संतान अधिक उत्पादक और मजबूत होती है। इसे संकर बल कहा जाता है।
महत्वपूर्ण तथ्य:
फसल सुधार के लिए सबसे पहले संकरण और चयन जैसी पारंपरिक विधियाँ अपनाई गईं।
आजकल जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) और जीन परिवर्तन तकनीक का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है।

फसल सुधार से प्राप्त लाभ

  • अधिक उपज और कम उत्पादन लागत
  • रोगों एवं कीटों से सुरक्षा
  • पोषण गुणवत्ता में सुधार
  • सुखे या अधिक वर्षा जैसी विपरीत परिस्थितियों में भी उत्पादन
  • किसानों की आय में वृद्धि

उदाहरण:

  • गेहूँ की किस्में: सोनालिका, करनाल सोना
  • धान की किस्में: IR-8, Jaya, Ratna
  • कपास की किस्म: Bt Cotton (कीटरोधी)
निष्कर्ष:
फसलों की किस्मों में सुधार से कृषि उत्पादन में स्थायी वृद्धि संभव होती है।
यह न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारता है बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा को भी मजबूत बनाता है।

1. जैविक तथा अजैविक कारक किस प्रकार फसल उत्पादन को प्रभावित करते हैं?

फसल उत्पादन पर अनेक प्रकार के जैविक (Biotic) तथा अजैविक (Abiotic) कारकों का प्रभाव पड़ता है।

(क) जैविक कारक :

वे कारक जो जीवित प्राणियों से संबंधित होते हैं।
ये फसलों की वृद्धि और उपज को प्रभावित करते हैं।

  • कीट-पतंगे: फसलों की पत्तियाँ, तना और फल खाकर हानि पहुँचाते हैं।
  • रोगजनक जीवाणु, कवक और विषाणु: फसलों में रोग फैलाते हैं।
  • खरपतवार (Weeds): पोषक तत्वों, जल और प्रकाश के लिए फसलों से प्रतिस्पर्धा करते हैं।
  • परजीवी पौधे: फसलों से पोषण लेकर उनकी वृद्धि रोक देते हैं।

(ख) अजैविक कारक :

ये निर्जीव पर्यावरणीय कारक हैं जो सीधे फसलों की वृद्धि को प्रभावित करते हैं।

  • मिट्टी की उर्वरता: पोषक तत्वों की कमी फसल की गुणवत्ता घटा देती है।
  • जल एवं वर्षा: अधिक या कम वर्षा दोनों ही फसलों को हानि पहुँचाती हैं।
  • तापमान: बहुत अधिक या बहुत कम तापमान फसल की वृद्धि को रोक सकता है।
  • प्रकाश: प्रकाश की मात्रा और अवधि पौधों के प्रकाश-संश्लेषण को प्रभावित करती है।
  • वायु और आर्द्रता: ये पौधों के वाष्पोत्सर्जन और रोग फैलाव को प्रभावित करते हैं।
निष्कर्ष:
फसल उत्पादन तभी अधिक हो सकता है जब जैविक कारकों को नियंत्रित किया जाए और अजैविक परिस्थितियाँ फसल की वृद्धि के अनुकूल हों।

2. फसल सुधार के लिए ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण क्या हैं?

फसल सुधार के लिए वैज्ञानिक ऐसे गुणों का चयन करते हैं जो उत्पादन, गुणवत्ता और प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं।
इन गुणों को ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण (Desirable Agronomic Traits) कहा जाता है।

मुख्य ऐच्छिक गुण निम्नलिखित हैं:

  • अल्प अवधि में पकने वाली फसल: ताकि वर्ष में अधिक फसल ली जा सके।
  • लंबे या छोटे पौधे: फसल के प्रकार के अनुसार — जैसे गेहूँ में छोटे पौधे अधिक उपयुक्त होते हैं।
  • अधिक उपज देने की क्षमता: जिससे उत्पादन और लाभ दोनों बढ़ें।
  • रोगों और कीटों के प्रति प्रतिरोधकता: ताकि रासायनिक दवाओं पर निर्भरता घटे।
  • सूखा या जलभराव सहन करने की क्षमता: ताकि बदलती जलवायु में भी फसल टिक सके।
  • पोषण गुणवत्ता में सुधार: जैसे – अधिक प्रोटीन, तेल या विटामिन वाली किस्में।
उदाहरण:
गेहूँ की बौनी किस्में (Dwarf Varieties) जैसे — ‘सोनालिका’ और ‘कalyan sona’
कम गिरने वाली, अधिक उपज देने वाली और रोगरोधी हैं। ये ऐच्छिक सस्य गुणों के अच्छे उदाहरण हैं।
निष्कर्ष:
ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुणों का चयन फसल सुधार कार्यक्रम की सफलता का आधार है।
इनसे फसलें न केवल अधिक उत्पादन देती हैं बल्कि पर्यावरणीय परिस्थितियों के प्रति अधिक अनुकूल भी बनती हैं।

फसल उत्पादन प्रबंधन (Crop Production Management)

फसल उत्पादन प्रबंधन का अर्थ है — फसल की बुवाई से लेकर कटाई और भंडारण तक की सभी गतिविधियों को
वैज्ञानिक, योजनाबद्ध और कुशल तरीके से संचालित करना, ताकि कम लागत में उच्चतम उपज और उत्तम गुणवत्ता प्राप्त हो सके।

मुख्य उद्देश्य:
अधिक उपज, बेहतर गुणवत्ता, लागत में कमी और प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग।

मुख्य घटक (Key Components)

क्र. घटक मुख्य बिंदु
1 भूमि की तैयारी जुताई, पाटा, मिट्टी परीक्षण, समतलीकरण एवं जल निकास सुनिश्चित करना।
2 बीज चयन व उपचार उच्च गुणवत्ता, रोग-प्रतिरोधक किस्में; बीजों का कवक/कीट नाशक से उपचार।
3 बुवाई तकनीक सही समय, गहराई एवं अंतर; सटीक बीज मात्रा; पंक्ति पद्धति/सघनता नियंत्रण।
4 सिंचाई प्रबंधन फसल-आधारित जल आवश्यक्ता; ड्रिप/स्प्रिंकलर जैसे जल-कुशल तरीके।
5 पोषक तत्व प्रबंधन जैविक खाद + रासायनिक उर्वरक का संतुलन; NPK अनुपात का ध्यान।
6 खरपतवार नियंत्रण निराई-गुड़ाई, मल्चिंग या उपयुक्त वीडिकाइड का प्रयोग।
7 कीट एवं रोग प्रबंधन जैविक नियंत्रण, फफूंदनाशक/कीटनाशक का नियंत्रित प्रयोग, फसल चक्र।
8 कटाई व भंडारण उचित समय पर कटाई; दानों को सुखाना; नमी व कीट संक्रमण से बचाव।
टिप: आधुनिक खेती जैसे संवर्धित बीज, ड्रिप सिंचाई, सूक्ष्मपोषक दिए जाने से लागत घटती और उपज बढ़ती है।

प्रैक्टिकल उपाय (Practical Practices)

  • मिट्टी परीक्षण कर के ही उर्वरक का उपयोग करें।
  • जल-नियमितता के लिए ड्रिप या स्प्रिंकलर पद्धति अपनाएँ।
  • फसल चक्र और मिश्रित खेती से मृदा उर्वरता बनी रहती है।
  • जैविक कीट नियंत्रण (परजीवियों/पक्षियों का प्रयोग) अपनाएँ।

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लाभ:
उच्च उपज, बेहतर गुणवत्ता, लागत-कमी, भूमि की स्थिर उर्वरता और पर्यावरण संरक्षण।

 निष्कर्ष

फसल उत्पादन प्रबंधन एक समग्र और वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें बीज, मिट्टी, सिंचाई, पोषक तत्व व रोग नियंत्रण का
उचित प्रबंधन किया जाता है। इससे किसान अधिक लाभ, टिकाऊ कृषि और उत्तम गुणवत्ता की फसल प्राप्त करते हैं।

पोषक प्रबंधन (Nutrient Management)

फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए पौधों को आवश्यक पोषक तत्व समय पर और सही मात्रा में देना ही पोषक प्रबंधन कहलाता है। पौधों की वृद्धि, स्वास्थ्य और उपज इसी पर निर्भर करती है।

मुख्य उद्देश्य: पौधों को सभी आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराकर फसल की उच्च गुणवत्ता और अधिक उपज सुनिश्चित करना।

आवश्यक पोषक तत्व

क्रम पोषक तत्व भूमिका / लाभ
1 नाइट्रोजन (N) पत्तियों और हरे भागों के विकास में सहायक; प्रोटीन निर्माण में महत्वपूर्ण।
2 फॉस्फोरस (P) बीज और फल के विकास में मदद करता है; जड़ प्रणाली मजबूत बनाता है।
3 पोटाश (K) फसल की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है; फूल और फल की गुणवत्ता सुधारता है।
4 सूक्ष्म तत्व लौह (Fe), जिंक (Zn), बोरॉन (B) जैसे तत्व पौधों के विकास और गुणात्मक सुधार में मदद करते हैं।

पोषक प्रबंधन के तरीके

  • जैविक खाद: गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद; मिट्टी की उर्वरता बनाए रखते हैं।
  • रासायनिक उर्वरक: NPK, सुपरफॉस्फेट, पोटाशियम सल्फेट आदि; पौधों को तुरंत पोषक उपलब्ध कराते हैं।
  • सूक्ष्म पोषक तत्व: आवश्यकता अनुसार मिट्टी में डालें।
  • फसल चक्र और मिश्रित खेती: मिट्टी की उर्वरता बनाए रखते हैं और पोषक संतुलन सुधारते हैं।
  • सिंचाई के समय उर्वरक: ड्रिप या फर्टिगेशन के जरिए पोषक तत्व सीधे पौधों तक पहुँचाएं।
लाभ: संतुलित पोषक प्रबंधन से फसल की उच्च उपज, बेहतर गुणवत्ता, रोग प्रतिरोधक क्षमता और मिट्टी की दीर्घकालीन उर्वरता सुनिश्चित होती है।

निष्कर्ष

पोषक प्रबंधन एक संतुलित और योजनाबद्ध प्रक्रिया है। इसमें जैविक और रासायनिक उर्वरक का सही मिश्रण, सिंचाई के अनुकूल समय और फसल चक्र का ध्यान रखा जाता है। इससे न केवल उपज बढ़ती है बल्कि पर्यावरणीय संतुलन भी बना रहता है।

पोषक तत्वों से संबंधित प्रश्न

1. वृहत् पोषक क्यों कहते हैं? क्या हैं और इन्हें बृहत् पोषक क्यों कहते है?

वृहत् पोषक (Macronutrients) वे पोषक तत्व हैं, जिनकी पौधों को बड़ी मात्रा में आवश्यकता होती है। इन्हें इसलिए वृहत् कहते हैं क्योंकि इनकी कमी से पौधों की वृद्धि और विकास प्रभावित होता है।

  • मुख्य वृहत् पोषक: नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P), पोटाश (K)
  • भूमिका: ये पोषक तत्व पौधों की पत्तियों, जड़, फूल और फल के विकास में महत्वपूर्ण हैं।

2. पौधे अपना पोषक कैसे प्राप्त करते हैं?

पौधे पोषक तत्व तीन मुख्य स्रोतों से प्राप्त करते हैं:

  1. मिट्टी से: मिट्टी में घुले हुए खनिज और पोषक तत्व पौधों की जड़ों द्वारा अवशोषित होते हैं।
  2. पानी के माध्यम से: सिंचाई का पानी भी मिट्टी से घुले पोषक तत्वों को पौधों तक पहुँचाता है।
  3. हवा से: मुख्य रूप से नाइट्रोजन, जिसे कुछ पौधे (जैसे मटर, मूँग) वायु से प्राप्त कर लेते हैं।
निष्कर्ष: पौधे अपने विकास और अधिक उपज के लिए वृहत् पोषक तत्वों और सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित सेवन करते हैं। मिट्टी, पानी और हवा इनके मुख्य स्रोत हैं।

खाद (Fertilizers / Manure)

फसलों की उच्च उपज और अच्छे स्वास्थ्य के लिए मिट्टी को पोषक तत्व प्रदान करने वाले पदार्थों को खाद कहते हैं। खाद पौधों को आवश्यक तत्व उपलब्ध कराकर उनकी वृद्धि और विकास में मदद करती है।

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खाद के प्रकार

  • जैविक खाद (Organic Manure): गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद। ये मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं और मिट्टी की संरचना को भी सुधारते हैं।
  • रासायनिक खाद (Chemical Fertilizers): NPK (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश) युक्त उर्वरक। ये पौधों को तुरंत पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं और उपज बढ़ाते हैं।
  • सूक्ष्म पोषक तत्व: लौह (Fe), जिंक (Zn), बोरॉन (B) आदि। ये छोटे मात्रा में आवश्यक होते हैं लेकिन पौधों के विकास और गुणात्मक सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
टिप: जैविक और रासायनिक खाद का संतुलित प्रयोग करें। इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और फसल की उपज भी अधिक होती है।

खाद का महत्व

  • फसल की उच्च उपज सुनिश्चित करता है।
  • पौधों को सभी आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराता है।
  • मिट्टी की उर्वरता और संरचना बनाए रखता है।
  • फसल की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।

निष्कर्ष

खाद पौधों के लिए जीवनदायिनी तत्वों का स्रोत है। सही प्रकार और समय पर खाद का प्रयोग फसल की गुणवत्ता और मात्रा दोनों बढ़ाता है। जैविक और रासायनिक खाद का संतुलित उपयोग कृषि को टिकाऊ बनाता है।

कंपोस्ट, वर्मी-कंपोस्ट और हरी खाद

1. कंपोस्ट (Compost)

कंपोस्ट जैविक कचरे (जैसे पत्तियाँ, किचन वेस्ट, गोबर) को **सड़ाकर बनाया गया जैविक खाद** है।
यह मिट्टी में पोषक तत्व बढ़ाता है और मिट्टी की जलधारण क्षमता सुधारता है।

लाभ:

  • मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है।
  • मिट्टी की संरचना सुधारता है।
  • रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता घटाता है।

2. वर्मी-कंपोस्ट (Vermicompost)

वर्मी-कंपोस्ट में कंपोस्ट बनाने की प्रक्रिया में पृथ्वी के केंचुए (Earthworms) की मदद ली जाती है।
ये केंचुए कचरे को जल्दी सड़ाते हैं और पौधों के लिए अत्यंत उपयोगी पोषक तत्व तैयार करते हैं।

लाभ:

  • जैविक पदार्थ जल्दी सड़ते हैं और पौधों के लिए उपलब्ध हो जाते हैं।
  • मिट्टी की जलधारण क्षमता और वायुरोधन क्षमता बढ़ती है।
  • फसल की रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार होता है।

3. हरी खाद (Green Manure)

हरी खाद वह पौधा है जिसे खेत में उगाकर जड़ या पूरी वनस्पति मिट्टी में मिलाई जाती है
यह मिट्टी को पोषक तत्व प्रदान करता है और मिट्टी की संरचना सुधारता है।

  • सामान्य रूप से बीन, मूँग, ग्वार जैसी पौधों का उपयोग किया जाता है।
  • जड़ में नाइट्रोजन बढ़ाने वाले जीवाणु भी होते हैं, जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं।
  • हरी खाद मिट्टी की नमी और वायुरोधन क्षमता सुधारती है।
निष्कर्ष: कंपोस्ट, वर्मी-कंपोस्ट और हरी खाद सभी मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और फसल की गुणवत्ता सुधारने के लिए महत्वपूर्ण जैविक खाद हैं।
इनका संतुलित उपयोग खेती को टिकाऊ और पर्यावरण-मित्र बनाता है।

उर्वरक (Fertilizer)

उर्वरक वे पदार्थ हैं जिन्हें मिट्टी में डालकर पौधों की वृद्धि और उत्पादन क्षमता बढ़ाई जाती है। वे पौधों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते हैं जो प्राकृतिक रूप से मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में नहीं होते।

महत्व:

  • पौधों की ताजगी और वृद्धि बढ़ाता है।
  • फसल की पैदावार में सुधार करता है।
  • मिट्टी की उर्वरता बनाए रखता है।

उर्वरकों के प्रकार

प्रकार मुख्य पोषक तत्व उदाहरण
नाइट्रोजन उर्वरक नाइट्रोजन (N) यूरेआ, अमोनियम सल्फेट
फास्फोरस उर्वरक फास्फोरस (P) सुपर फॉस्फेट
पोटाश उर्वरक पोटेशियम (K) पोटेशियम क्लोराइड

प्राकृतिक और रासायनिक उर्वरक

  • प्राकृतिक उर्वरक: गोबर, कंपोस्ट, हरी खाद।
  • रासायनिक उर्वरक: एनपीके मिश्रण, अमोनियम सल्फेट, सुपर फॉस्फेट।
टिप: उर्वरक का सही मात्रा और समय पर उपयोग फसल की गुणवत्ता और मात्रा दोनों बढ़ाता है। अधिक उर्वरक लगाने से मिट्टी और पर्यावरण को नुकसान हो सकता है।

सिंचाई (Irrigation)

सिंचाई वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा फसल की वृद्धि और उत्पादन को सुनिश्चित करने के लिए खेत में पानी पहुँचाया जाता है। यह प्राकृतिक वर्षा के अलावा अतिरिक्त पानी प्रदान करती है।

महत्व:

  • फसल को सूखे से बचाती है।
  • फसल की पैदावार और गुणवत्ता बढ़ाती है।
  • मिट्टी में नमी बनाए रखती है।

सिंचाई के प्रकार

प्रकार विवरण उदाहरण
भूमि सिंचाई (Surface Irrigation) पानी खेत की सतह पर बहाया जाता है। नहर, तालाब, झरना
ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation) पानी सीधे पौधे की जड़ तक धीरे-धीरे पहुँचाया जाता है। टेप और ड्रिप पाइप
स्प्रिंकलर सिंचाई (Sprinkler Irrigation) पानी को स्प्रिंकलर से छिड़ककर फसल तक पहुँचाया जाता है। स्प्रिंकलर मशीन

सिंचाई के साधन

  • नदी और नहर से जलाशय
  • ट्यूबवेल और बोरवेल
  • कुंआ और तालाब
टिप: आधुनिक सिंचाई विधियाँ जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर पानी की बचत करती हैं और फसल की पैदावार बढ़ाती हैं। अत्यधिक सिंचाई से मिट्टी की उर्वरता और फसल पर विपरीत असर पड़ सकता है।

फसल पैटर्न (Cropping Pattern)

फसल पैटर्न उस व्यवस्था को कहते हैं जिसके अनुसार किसी क्षेत्र में वर्ष भर में विभिन्न प्रकार की फसलों की खेती की जाती है। इसे भूमि, जल स्रोत, जलवायु और फसल की मांग के आधार पर योजना बनाकर तय किया जाता है।

महत्व:

  • भूमि और जल संसाधनों का प्रभावी उपयोग।
  • फसल उत्पादन और पैदावार में वृद्धि।
  • मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना।
  • कृषक की आय में स्थिरता।

प्रमुख फसल पैटर्न

फसल पैटर्न विवरण उदाहरण
एकल फसल पैटर्न (Mono Cropping) साल भर एक ही फसल की खेती की जाती है। गेहूँ क्षेत्र, धान क्षेत्र
युग्मित फसल पैटर्न (Mixed Cropping) एक ही खेत में दो या दो से अधिक फसलें एक साथ उगाई जाती हैं। गेहूँ + दाल, मक्का + सोयाबीन
क्रमिक फसल पैटर्न (Crop Rotation) एक खेत में अलग-अलग मौसम में अलग फसलें उगाई जाती हैं। धान के बाद गेहूँ, मक्का के बाद दाल
सहायक फसल पैटर्न (Relay Cropping) एक फसल की कटाई से पहले दूसरी फसल की बुवाई कर दी जाती है। धान + मूंग
टिप: सही फसल पैटर्न का चयन जलवायु, भूमि की उर्वरता और बाजार की मांग के अनुसार करना चाहिए। इससे फसल उत्पादन अधिक और सतत बनता है।

फसल सुरक्षा प्रबंधन (Crop Protection Management)

फसल सुरक्षा प्रबंधन का उद्देश्य फसलों को कीट, रोग, खरपतवार और अन्य हानिकारक कारकों से सुरक्षित रखना है, ताकि उत्पादन और गुणवत्ता बनी रहे।

महत्व:

  • फसल का नुकसान कम करना।
  • उच्च उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता सुनिश्चित करना।
  • कृषक की आय सुरक्षित करना।
  • प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण।

मुख्य फसल सुरक्षा उपाय

उपाय विवरण उदाहरण/नोट
कीट नियंत्रण (Pest Control) कीटों और जीवाणुओं से फसल को बचाना। कीटनाशक का प्रयोग, जैविक नियंत्रण
रोग नियंत्रण (Disease Management) फसलों में रोग फैलने से रोकना। फफूंदी नाशक, रोग प्रतिरोधी बीज
खरपतवार नियंत्रण (Weed Management) फसल की वृद्धि में बाधक पौधों को हटाना। मुल्चिंग, खरपतवारनाशी रासायनिक दवा
सुरक्षात्मक उपाय (Preventive Measures) बीज, मिट्टी और उपकरण से रोग और कीट न फैलने दें। साफ-सफाई, रोग मुक्त बीज
टिप: फसल सुरक्षा के लिए जैविक, रासायनिक और यांत्रिक उपायों का संतुलित प्रयोग करें। समय पर निरीक्षण और रोग/कीट की पहचान अत्यंत आवश्यक है।

प्रश्न:

निम्नलिखित में से कौन सी परिस्थिति में सबसे अधिक लाभ होगा? और क्यों?

  • (a) किसान उच्च कोटि के बीज का उपयोग करें, लेकिन सिंचाई ना करें अथवा उर्वरक का उपयोग ना करें।
  • (b) किसान सामान्य बीजों का उपयोग करें, लेकिन सिंचाई करें तथा उर्वरक का उपयोग करें।
  • (c) किसान अच्छी किस्म के बीज का प्रयोग करें, सिंचाई करें, उर्वरक का उपयोग करें तथा फसल सुरक्षा की विधियाँ अपनाएँ।

विश्लेषण:

  • (a) उच्च गुणवत्ता वाले बीज की क्षमता पूरी नहीं होगी क्योंकि सिंचाई और उर्वरक नहीं है → उत्पादन कम।
  • (b) सामान्य बीज + सिंचाई + उर्वरक → उत्पादन बेहतर, लेकिन उच्चतम क्षमता नहीं।
  • (c) अच्छी किस्म का बीज + सिंचाई + उर्वरक + फसल सुरक्षा → सभी उचित प्रबंधन अपनाए गए → उच्चतम उत्पादन और लाभ।
उत्तर: (c)
कारण: उच्च गुणवत्ता के बीज, पर्याप्त पानी, पोषक तत्व और फसल सुरक्षा उपायों का संतुलित प्रयोग फसल की वृद्धि, उत्पादन और गुणवत्ता को अधिकतम करता है। इसलिए किसान को सबसे अधिक लाभ मिलता है।

अनाज का भंडारण (Grain Storage)

अनाज का भंडारण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कटाई के बाद फसलों को सुरक्षित रखा जाता है ताकि उनकी गुणवत्ता बनी रहे और कीट, रोग या अन्य हानिकारक तत्वों से नुकसान न हो।

महत्व:

  • अनाज की गुणवत्ता और पोषण मूल्य बनाए रखना।
  • कीट, रोग और नमी से नुकसान रोकना।
  • बाजार में आपूर्ति सुनिश्चित करना और कीमत स्थिर रखना।

अनाज भंडारण के प्रकार

भंडारण का प्रकार विवरण उदाहरण/नोट
परंपरागत भंडारण (Traditional Storage) घरों, चबूतरों या मिट्टी/काठ के डिब्बों में अनाज रखा जाता है। अन्न पात्र, मिट्टी के पात्र
आधुनिक भंडारण (Modern Storage) साइलो, गोदाम और कंटेनर में नियंत्रित तापमान और नमी के साथ रखा जाता है। साइलो, एयर-टाइट कंटेनर

अनाज भंडारण के लिए सावधानियाँ

  • भंडारण से पहले अनाज को साफ और सुखा लें।
  • कीट और रोग नियंत्रण के लिए सुरक्षित उपाय करें।
  • नमी और पानी से दूर रखें।
  • नियमित निरीक्षण और आवश्यक्ता अनुसार वेंटिलेशन करें।
टिप: उचित भंडारण न केवल अनाज की क्षति कम करता है बल्कि किसान की आय को स्थिर और सुरक्षित भी बनाता है।

प्रश्न 1:

फसल की सुरक्षा के लिए निरोधक विधियाँ तथा जैविक नियंत्रण क्यों अच्छी समझा जाता है?

उत्तर:

  • निरोधक विधियाँ और जैविक नियंत्रण पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते।
  • कीट और रोग नियंत्रण के लिए प्राकृतिक और सुरक्षित उपाय प्रदान करते हैं।
  • रासायनिक कीटनाशकों की तुलना में लागत कम और प्रभाव लंबे समय तक रहता है।
  • फसल की गुणवत्ता और उत्पादन सुरक्षित रहते हैं।

प्रश्न 2:

भंडारण की प्रक्रिया में कौन से कारक अनाज की हानि के लिए उत्तरदायी हैं?

उत्तर:

  • अत्यधिक नमी और पानी का प्रवेश।
  • कीट, चूहे और अन्य जीवाणु।
  • भंडारण के लिए उचित तापमान और वेंटिलेशन का अभाव।
  • अनाज को साफ और सुखा कर न रखने से रोग फैलना।
  • गलत भंडारण तकनीक या पुराने गोदाम का उपयोग।

पशुपालन (Animal Husbandry)

पशुपालन वह कृषि संबंधी गतिविधि है जिसमें मानव विभिन्न पशुओं को पालकर उनसे दूध, मांस, ऊन, अंडे आदि प्राप्त करता है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की आय में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

महत्व:

  • दूध, मांस, अंडे और ऊन जैसी आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त होती हैं।
  • कृषक की आय में स्थिरता और वृद्धि होती है।
  • खाद्य उत्पादन में विविधता आती है।
  • कृषि कार्य में पशुओं का उपयोग जैसे हल जोतने में मदद।

मुख्य प्रकार के पशु

पशु उत्पाद/उपयोग
गाय/भैंस दूध, गोबर, खेती में सहायक
भेड़/बकरी दूध, मांस, ऊन
मुर्गी अंडे और मांस
सुअर मांस

पशुपालन में ध्यान देने योग्य बातें

  • पशुओं को स्वच्छ और पर्याप्त स्थान प्रदान करना।
  • संतुलित आहार और पर्याप्त पानी देना।
  • रोगों से सुरक्षा और समय-समय पर टीकाकरण।
  • उत्पादकता बढ़ाने के लिए उचित प्रजनन प्रबंधन।
टिप: पशुपालन केवल लाभ के लिए नहीं, बल्कि पशुओं की भलाई और स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए भी जरूरी है।

पशु उत्पादों का पोषक मान (प्रतिशत में)

पशु उत्पाद वसा (%) प्रोटीन (%) शक्कर (%) खनिज (%) जल (%) विटामिन
दूध (गाय) 3.60 4.00 4.50 0.70 87.20 B1, B2, B12, D, E
अंडा 12.00 13.00 * 1.00 74.00 B2, D
मांस 3.60 21.10 * 1.10 74.20 B2, B12
मछली 2.50 19.00 * 1.30 77.20 Niacin, D, A

पशु कृषि (Animal Agriculture)

पशु कृषि वह कृषि प्रणाली है जिसमें किसान विभिन्न पशुओं का पालन कर उनके उत्पादों का उपयोग करता है। यह मानव जीवन के लिए भोजन, कपड़ा और अन्य संसाधन प्रदान करता है।

महत्व:

  • दूध, मांस, अंडा, ऊन आदि उपलब्ध कराता है।
  • कृषक की आय में वृद्धि और स्थिरता।
  • कृषि कार्यों में सहायता जैसे हल जोतना।
  • अतिरिक्त खाद्य और कृषि अवशेषों का उपयोग।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था में योगदान।

पशु कृषि के मुख्य अंग

  • दुग्ध उत्पादन: गाय, भैंस, बकरी आदि से दूध प्राप्त करना।
  • मांस उत्पादन: मांस वाली पशु जातियों का पालन।
  • अंडा उत्पादन: मुर्गी, बटेर आदि से अंडे प्राप्त करना।
  • ऊनी उत्पादन: भेड़ या ऊन देने वाले पशुओं का पालन।
  • मल/गोबर उत्पादन: खाद और ऊर्जा के स्रोत के रूप में।

पशु कृषि में ध्यान देने योग्य बातें

  • पशुओं को स्वच्छ और पर्याप्त स्थान देना।
  • संतुलित आहार और पानी सुनिश्चित करना।
  • रोगों से सुरक्षा और समय-समय पर टीकाकरण।
  • उत्पादकता बढ़ाने के लिए उचित प्रजनन और प्रबंधन।
टिप: पशु कृषि न केवल आर्थिक लाभ देती है बल्कि खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

कुक्कुट (मुर्गी पालन)

कुक्कुट पालन में मुर्गियों का पालन किया जाता है ताकि उनसे अंडा, मांस और अन्य उत्पाद प्राप्त किए जा सकें। यह छोटे और बड़े दोनों प्रकार के किसानों के लिए लाभकारी व्यवसाय है।

महत्व:

  • अंडा और मांस प्राप्ति के लिए मुख्य स्रोत।
  • कम निवेश में जल्दी लाभ।
  • ग्रामीण आय और रोजगार में योगदान।
  • अन्य कृषि अवशेषों का उपयोग जैसे चारा और खाद।

मुर्गी पालन के प्रकार

  • अंडा उत्पादन मुर्गी पालन: अंडा प्राप्त करने के लिए।
  • मांस उत्पादन मुर्गी पालन: मांस उत्पादन के लिए।
  • संकर मुर्गी पालन: अंडा और मांस दोनों के लिए।

ध्यान देने योग्य बातें

  • स्वच्छ और हवादार स्थान पर मुर्गियों का पालन।
  • संतुलित आहार और पर्याप्त पानी देना।
  • रोगों से सुरक्षा और समय-समय पर टीकाकरण।
  • उपयुक्त प्रजनन और स्वस्थ पालन।
  • उत्पाद (अंडे/मांस) का सही संग्रहण और भंडारण।
टिप: मुर्गी पालन एक लाभकारी व्यवसाय है, लेकिन सफलता के लिए सही प्रबंधन, स्वच्छता और पोषण आवश्यक है।

मत्स्य उत्पादन (Fish Farming / Aquaculture)

मत्स्य उत्पादन में मछली और अन्य जलीय जीवों का पालन किया जाता है ताकि भोजन, आय और रोजगार के साधन प्राप्त किए जा सकें। यह कृषि के साथ मिलकर ग्रामीण विकास और पोषण सुरक्षा में योगदान देता है।

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महत्व:

  • सस्ती और पोषक तत्वों से भरपूर भोजन।
  • ग्रामीण आय और रोजगार में योगदान।
  • पानी के संसाधनों का बेहतर उपयोग।
  • अन्य कृषि अवशेषों और पशु अपशिष्ट का उपयोग चारे के रूप में।

मत्स्य उत्पादन के प्रकार

  • सतही जल मछली पालन (Pond Culture): तालाब, पोखर या जलाशय में मछली पालन।
  • तंत्रिका जल मछली पालन (Cage Culture): तालाब या नदी में जाल या पिंजरे में पालन।
  • टैंक पालन (Tank Culture): सीमित क्षेत्र में नियंत्रित टैंक में पालन।
  • जलीय संयंत्र उत्पादन (Integrated Aquaculture): मछली पालन के साथ कृषि और पशुपालन का मिश्रण।

ध्यान देने योग्य बातें

  • स्वच्छ और ऑक्सीजन युक्त जल सुनिश्चित करें।
  • उपयुक्त मछली प्रजाति का चयन।
  • संतुलित चारा और पोषण।
  • रोग और कीट नियंत्रण।
  • नियमित निगरानी और उत्पादन का रिकॉर्ड रखना।
टिप: सफल मत्स्य उत्पादन के लिए जल की गुणवत्ता, पोषण और रोग नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।

समुद्री मात्स्यिकी (Marine Fisheries)

समुद्री मात्स्यिकी में समुद्र और उसके तटवर्ती क्षेत्रों में मछली और अन्य जलीय जीवों का पालन और संग्रह किया जाता है। यह मत्स्य उद्योग का महत्वपूर्ण हिस्सा है और देश की खाद्य सुरक्षा और निर्यात के लिए महत्वपूर्ण है।

महत्व:

  • समुद्री मछली से प्रोटीन और अन्य पोषक तत्व प्राप्त होते हैं।
  • ग्रामीण और तटीय क्षेत्रों में रोजगार सृजन।
  • देश की निर्यात आय में योगदान।
  • समुद्री संसाधनों का टिकाऊ उपयोग।

मुख्य समुद्री मात्स्यिकी गतिविधियाँ

  • मछली पकड़ना (Capture Fisheries): समुद्र से जंगली मछली और अन्य जलीय जीवों का संग्रह।
  • समुद्री पालन (Mariculture): समुद्री मछली, झींगा, सीप आदि का नियंत्रित पालन।
  • जलीय संसाधन प्रबंधन: टिकाऊ मत्स्यिकी और समुद्री पर्यावरण का संरक्षण।

ध्यान देने योग्य बातें

  • समुद्री मछली पकड़ने में पर्यावरण और प्रजातियों का संरक्षण।
  • उपयुक्त उपकरण और जाल का उपयोग।
  • मछली की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करना।
  • समुद्री प्रदूषण से बचाव और जैव विविधता का संरक्षण।
टिप: समुद्री मात्स्यिकी में संतुलित और टिकाऊ तरीके अपनाना आवश्यक है ताकि मछली उत्पादन स्थिर और पर्यावरण सुरक्षित रहे।

अंतःस्थली मात्स्यिकी (Inland Fisheries)

अंतःस्थली मात्स्यिकी में झीलों, तालाबों, नदियों और अन्य स्थलीय जल स्रोतों में मछली और जलीय जीवों का पालन और संग्रह किया जाता है। यह ग्रामीण आय, रोजगार और पोषण सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।

महत्व:

  • स्थलीय मछली से प्रोटीन और पोषक तत्व प्राप्त होते हैं।
  • ग्रामीण और तटीय क्षेत्रों में रोजगार।
  • आर्थिक विकास और स्थानीय आय में योगदान।
  • सतत जल संसाधन उपयोग और पर्यावरण संरक्षण।

मुख्य अंतःस्थली मात्स्यिकी गतिविधियाँ

  • तालाब और झील में पालन (Pond and Lake Culture): मछली पालन के लिए नियंत्रित जलाशय।
  • नदी और जलाशय में जंगली मछली पकड़ना (Capture Fisheries): प्राकृतिक जल स्रोतों से मछली संग्रह।
  • इंटीग्रेटेड फिशिंग सिस्टम: कृषि और मत्स्य पालन का मिश्रित उत्पादन।

ध्यान देने योग्य बातें

  • जल की गुणवत्ता और ऑक्सीजन स्तर का निरीक्षण।
  • उपयुक्त मछली प्रजातियों का चयन।
  • संतुलित चारा और पोषण।
  • रोग नियंत्रण और नियमित निगरानी।
  • स्थलीय जल संसाधनों का टिकाऊ प्रबंधन।
टिप: सफल अंतःस्थली मात्स्यिकी के लिए जल की गुणवत्ता, पोषण और रोग नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।

मधुमक्खी पालन (Beekeeping / Apiculture)

मधुमक्खी पालन में मधुमक्खियों का पालन किया जाता है ताकि उनसे शहद, मोम, परागकण और अन्य उपयोगी उत्पाद प्राप्त किए जा सकें। यह एक लाभकारी कृषि व्यवसाय है और कृषि पारिस्थितिकी में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

महत्व:

  • शहद, मोम और अन्य उत्पाद प्राप्ति।
  • फसल पर परागण (Pollination) के माध्यम से कृषि उत्पादन बढ़ाना।
  • कम निवेश में आय का स्रोत।
  • पर्यावरण और जैव विविधता में योगदान।

मधुमक्खी पालन की विधियाँ

  • परंपरागत पालन: पेड़ों या प्राकृतिक छत्तों में मधुमक्खियों का पालन।
  • आधुनिक/संवर्धित पालन: बॉक्स या लंगस्ट्रोथ तकनीक में मधुमक्खियों का नियंत्रित पालन।
  • पॉलिनेशन सेवाएँ: मधुमक्खियों का उपयोग फसलों के परागण के लिए।

ध्यान देने योग्य बातें

  • छत्तों को स्वच्छ और सुरक्षित स्थान पर रखें।
  • मधुमक्खियों को संतुलित आहार और फूलों की उपलब्धता सुनिश्चित करें।
  • रोग और कीट नियंत्रण का ध्यान रखें।
  • शहद और मोम का सही संग्रहण और भंडारण करें।
  • मधुमक्खियों की प्रजाति और पालन तकनीक का सही चयन करें।
टिप: मधुमक्खी पालन में धैर्य और सही प्रबंधन आवश्यक है, इससे कृषि उत्पादन और आय दोनों में वृद्धि होती है।

क्या सीखा?

फसल पोषण और उर्वरक

  • फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्व: हवा से कार्बन और ऑक्सीजन, पानी से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन, मिट्टी से अन्य पोषक तत्व।
  • पोषक तत्वों के प्रकार:
    • वृहत्-पोषक: अधिक मात्रा में आवश्यक
    • सूक्ष्म पोषक: कम मात्रा में आवश्यक
  • फसल के मुख्य स्रोत: खाद और उर्वरक
  • कार्बनिक कृषि: रासायनिक उर्वरक, पीड़कनाशक और शाकनाशक न्यूनतम या शून्य; जैविक खाद और पुनर्चक्रित अपशिष्ट का अधिकतम उपयोग।

फसल उत्पादन तंत्र

  • मिश्रित खेती तंत्र: एक फार्म में फसल उत्पादन और पशुपालन दोनों का मिश्रण।
  • मिश्रित फसल: एक ही खेत में दो या दो से अधिक फसलें एक साथ उगाना।
  • अंतराफसलीकरण: दो या दो से अधिक फसलें निश्चित कतार पैटर्न में उगाना।
  • फसल चक्र: एक ही खेत में विभिन्न फसलों को पूर्व नियोजित अनुक्रम में उगाना।
  • नस्ल सुधार: उच्च उत्पादन, गुणवत्ता, रोग प्रतिरोध, अल्प परिपक्वन काल और बदलती परिस्थितियों के लिए।

पशुपालन

  • फार्म पशुओं की देखभाल और प्रबंधन: आवास, आहार, प्रजनन और रोग नियंत्रण।
  • कुक्कुट पालन:
    • अंडे और मुर्गों का मांस उत्पादन।
    • उत्पादन बढ़ाने के लिए देशी और विदेशी नस्लों का संकरण।
    • ब्रौलर उत्पादन और अंडा उत्पादन शामिल।

मत्स्यिकी

  • मछलियाँ समुद्री और अंतःस्थली स्रोतों से प्राप्त की जाती हैं।
  • मछली उत्पादन बढ़ाने के लिए उनका संवर्धन समुद्र और अंतःस्थली पारिस्थितिक प्रणालियों में किया जाता है।
  • समुद्री मछली पकड़ने में प्रतिध्वनि गभीरतामापी और उपग्रह द्वारा निर्देशित जाल का प्रयोग।
  • मिश्रित मछली संवर्धन तंत्र मत्स्य पालन में अपनाया जाता है।

मधुमक्खी पालन

  • मधुमक्खी पालन से शहद और मोम प्राप्त होते हैं।

अभ्यास प्रश्न और उत्तर

1. फसल उत्पादन की एक विधि का वर्णन करो जिससे अधिक पैदावार प्राप्त हो सके।

उत्तर:

  • मिश्रित फसल: एक ही खेत में दो या दो से अधिक फसलें उगाना। मिट्टी का अधिकतम उपयोग और उत्पादन वृद्धि।
  • अंतराफसलीकरण: फसलों को कतारों में उगाना। सूर्य की रोशनी और पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग।
  • उर्वरक और सिंचाई: उचित पोषण और पानी देने से फसल स्वस्थ रहती है और पैदावार बढ़ती है।
  • उच्च गुणवत्ता बीज और नस्ल सुधार: बेहतर बीज और अनुकूल किस्म का चयन उत्पादन बढ़ाने में सहायक।

2. खेतों में खाद तथा उर्वरक का उपयोग क्यों करते हैं?

  • मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए।
  • फसल की वृद्धि, स्वास्थ्य और पैदावार बढ़ाने के लिए।
  • अच्छी गुणवत्ता और पोषक तत्वों से भरपूर उपज के लिए।

3. अंतराफसलीकरण तथा फसल चक्र के क्या लाभ हैं?

  • अंतराफसलीकरण: मिट्टी और पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग, रोग और कीट नियंत्रण, उत्पादन वृद्धि।
  • फसल चक्र: भूमि की उर्वरता बनाए रखना, मृदा प्रदूषण कम करना, फसल रोगों और कीटों की संख्या कम करना।

4. आनुवंशिक फेरबदल क्या हैं? कृषि प्रणालियों में ये कैसे उपयोगी हैं?

  • **आनुवंशिक फेरबदल:** पौधों और पशुओं की विशेषताएँ बदलकर नई किस्में तैयार करना।
  • **उपयोगिता:** उच्च उत्पादन, रोग प्रतिरोधक क्षमता, बेहतर गुणवत्ता, बदलती जलवायु और परिस्थितियों के लिए अनुकूल।

5. भंडार गृहों (गोदामों) में अनाज की हानि कैसे होती है?

  • कीट और कृमि (जैसे चूहे, कीड़े) के कारण।
  • नमी और पानी के रिसाव से।
  • अत्यधिक तापमान और वायु प्रवाह की कमी से।
  • गलत भंडारण पद्धति और सफाई की कमी।

6. किसानों के लिए पशु पालन प्रणालियाँ कैसे लाभदायक हैं?

  • आय का अतिरिक्त स्रोत: दूध, मांस, अंडे आदि।
  • खाद और जैविक अपशिष्टों का पुनर्चक्रण।
  • ग्रामीण रोजगार और आर्थिक सुरक्षा।

7. पशु पालन के क्या लाभ हैं?

  • पोषक तत्वों से भरपूर उत्पाद उपलब्ध कराना।
  • आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा।
  • कृषि उत्पादन में सहायक (जैसे खेत में काम करने वाले पशु)।

8. उत्पादन बढ़ाने के लिए कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन तथा मधुमक्खी पालन में क्या समानताएँ हैं?

  • उत्पाद (अंडा, मांस, मछली, शहद) प्राप्त करने के लिए नियंत्रित पालन।
  • उत्पादन बढ़ाने के लिए उच्च गुणवत्ता नस्लों का चयन।
  • रोग नियंत्रण और उचित आहार की आवश्यकता।
  • सतत और लाभकारी व्यवसाय।

9. प्रग्रहण मत्स्यन, मेरीकल्चर तथा जल संवर्धन में क्या अंतर है?

  • प्रग्रहण मत्स्यन (Capture Fisheries): प्राकृतिक स्रोतों से मछली पकड़ना।
  • मेरीकल्चर (Mariculture): समुद्री मछलियों और जलीय जीवों का नियंत्रित पालन।
  • जल संवर्धन (Inland/ Aquaculture): तालाब, झील और नदी जैसे अंतःस्थली जल में मछली पालन।

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