फसल उत्पादन और प्रबंधन class 8 ncert Notes in Hindi
अध्याय 1 : फसल उत्पादन एवं प्रबंधन
परिचय : भारत एक कृषि प्रधान देश है। हमारे देश की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। किसान विभिन्न प्रकार की फसलों की खेती करते हैं ताकि मनुष्यों और जानवरों की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। फसल उत्पादन को बेहतर बनाने के लिए वैज्ञानिक विधियों और तकनीकों का उपयोग किया जाता है।
भारत में मुख्य रूप से दो प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं — खरीफ फसलें (बरसात में बोई जाती हैं) और रबी फसलें (सर्दियों में बोई जाती हैं)।
फसल क्या है?
जब एक ही प्रकार के पौधों को एक निश्चित क्षेत्र में बड़े पैमाने पर उगाया जाता है तो उसे फसल (Crop) कहा जाता है।
| फसल का प्रकार | उदाहरण | बोने का मौसम |
|---|---|---|
| खरीफ फसलें | धान, मक्का, बाजरा, कपास | जून से अक्टूबर |
| रबी फसलें | गेहूँ, जौ, मटर, सरसों | नवंबर से अप्रैल |
कृषि के प्रमुख कार्य (Agricultural Practices)
फसल उत्पादन के लिए किसान कुछ प्रमुख चरणों का पालन करते हैं जिन्हें कृषि के कार्य कहा जाता है। ये हैं:
- भूमि की तैयारी (Preparation of soil)
- बीज की बुआई (Sowing of seeds)
- खाद और उर्वरक डालना (Adding manure and fertilizers)
- सिंचाई (Irrigation)
- निराई और गुड़ाई (Weeding)
- कटाई (Harvesting)
- भंडारण (Storage)
कृषि पद्धतियां एवं फसलों के प्रकार | रबी, खरीफ और ज़ायद फसलें
परिचय : भारत में विभिन्न क्षेत्रों में मौसम, वर्षा और तापमान के अनुसार अलग-अलग फसलें उगाई जाती हैं। इन फसलों की खेती की विधियों और समय के आधार पर कृषि को विभिन्न पद्धतियों में बाँटा गया है। मुख्यतः तीन प्रकार की फसलें होती हैं — रबी, खरीफ और ज़ायद।
फसल उत्पादन और प्रबंधन class 8 ncert Notes in Hindi
भारत में कृषि मुख्यतः मौसमी वर्षा (Monsoon) पर निर्भर करती है। वर्षा की मात्रा और समय के अनुसार फसलों का चयन किया जाता है।
कृषि पद्धतियां (Agricultural Practices)
कृषि पद्धतियां वे प्रक्रियाएं हैं जिनका प्रयोग किसान भूमि तैयार करने, बीज बोने, खाद डालने, सिंचाई करने, निराई-गुड़ाई, कटाई और भंडारण के लिए करते हैं। इन विधियों से फसल की उपज और गुणवत्ता दोनों में सुधार होता है।
- भूमि की जुताई और तैयारी
- अच्छे बीजों का चयन और बुआई
- खाद एवं उर्वरकों का उपयोग
- सिंचाई की उचित व्यवस्था
- निराई-गुड़ाई द्वारा खरपतवार नियंत्रण
- कटाई, मड़ाई और भंडारण
भारत की मुख्य फसलें
भारत में फसलों को उनकी बुआई और कटाई के समय के आधार पर तीन मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है —
| फसल का प्रकार | बोने का समय | कटाई का समय | मुख्य उदाहरण |
|---|---|---|---|
| खरीफ फसलें | जून – जुलाई | सितंबर – अक्टूबर | धान, मक्का, बाजरा, ज्वार, कपास, मूंगफली |
| रबी फसलें | अक्टूबर – नवंबर | मार्च – अप्रैल | गेहूँ, जौ, मटर, चना, सरसों, आलू |
| ज़ायद फसलें | मार्च – अप्रैल | जून – जुलाई | तरबूज, खरबूजा, खीरा, लौकी, ककड़ी, सूरजमुखी |
खरीफ, रबी और ज़ायद फसलें भारत की कृषि प्रणाली की रीढ़ हैं। इन फसलों की सही पहचान और मौसम के अनुसार उनकी खेती करने से उत्पादन अधिक और गुणवत्ता बेहतर होती है।
मिट्टी की तैयारी (Preparation of Soil) | Class 8 Science Notes in Hindi
परिचय : फसल उत्पादन की प्रक्रिया में सबसे पहला चरण मिट्टी की तैयारी है। अच्छी फसल के लिए भूमि का उपजाऊ और भुरभुरी होना आवश्यक है। भूमि की सही प्रकार से तैयारी करने से पौधों की जड़ें आसानी से बढ़ती हैं और उन्हें पर्याप्त पोषक तत्व प्राप्त होते हैं।
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क्या आप जानते हैं? – मिट्टी की ऊपरी परत को जुताई द्वारा पलटने से वायु संचार बेहतर होता है और सूक्ष्मजीव सक्रिय रहते हैं।
मिट्टी की तैयारी के मुख्य चरण
मिट्टी की तैयारी में तीन प्रमुख प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं —
- जुताई (Ploughing)
- समान करना (Levelling)
- खाद डालना (Manuring)
1.जुताई (Ploughing)
यह मिट्टी की तैयारी का पहला कदम है। जुताई के दौरान भूमि की ऊपरी परत को पलटा जाता है ताकि मिट्टी भुरभुरी बने और उसमें वायु का आवागमन हो सके। इससे जड़ें आसानी से बढ़ पाती हैं।
| जुताई के उपकरण | विवरण |
|---|---|
| हल (Plough) | पारंपरिक लकड़ी या लोहे का औजार जिससे मिट्टी पलटी जाती है। |
| कुल्टीवेटर (Cultivator) | ट्रैक्टर से जुड़ा आधुनिक उपकरण जो समय और श्रम दोनों बचाता है। |
| हंसिया/खुरपी | छोटी भूमि के टुकड़ों में खरपतवार हटाने व मिट्टी ढीली करने के लिए। |
2. समान करना (Levelling)
जुताई के बाद मिट्टी को समतल करना आवश्यक होता है ताकि जल का समान वितरण हो सके और बीज समान गहराई पर बोए जा सकें। इसके लिए लेवलर (Leveller) का प्रयोग किया जाता है।
3.खाद डालना (Manuring)
भूमि तैयार करने का अंतिम चरण उसमें खाद या उर्वरक मिलाना है। इससे मिट्टी में पोषक तत्वों की पूर्ति होती है।
| खाद का प्रकार | उदाहरण | लाभ |
|---|---|---|
| प्राकृतिक खाद | गोबर, कम्पोस्ट, जैविक अपशिष्ट | मिट्टी की संरचना और उर्वरता में सुधार |
| रासायनिक उर्वरक | यूरिया, DAP, NPK | त्वरित पोषण उपलब्ध कराते हैं |
मिट्टी की सही तैयारी से फसल की उपज में वृद्धि होती है। भुरभुरी, पोषक तत्वों से भरपूर और समतल भूमि ही स्वस्थ पौधों के लिए सबसे उपयुक्त होती है।
कृषि औज़ार (Agricultural Implements) | Class 8 Science Notes in Hindi
परिचय : फसल उत्पादन की प्रक्रिया में किसान विभिन्न प्रकार के औज़ारों का उपयोग करते हैं। ये औज़ार भूमि तैयार करने, बीज बोने, निराई-गुड़ाई करने, सिंचाई, कटाई और भंडारण जैसे कार्यों में सहायक होते हैं। आधुनिक युग में पारंपरिक औज़ारों के साथ-साथ यांत्रिक औज़ारों का भी प्रयोग बढ़ा है जिससे समय और श्रम दोनों की बचत होती है।
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भारत में प्राचीन काल से हल, खुरपी और दरांती जैसे औज़ारों का प्रयोग किया जाता रहा है। अब ट्रैक्टर, कल्टीवेटर और हार्वेस्टर जैसे यांत्रिक उपकरणों ने कृषि को और अधिक उन्नत बना दिया है।
प्रमुख कृषि औज़ार (Main Agricultural Tools)
| औज़ार का नाम | चित्र (संकेत) | उपयोग | प्रकार |
|---|---|---|---|
| हल (Plough) | मिट्टी की जुताई और पलटाई के लिए। इससे मिट्टी भुरभुरी होती है। | लकड़ी का हल, लोहे का हल | |
| कुल्टीवेटर (Cultivator) | ट्रैक्टर से जुड़ा आधुनिक उपकरण जो मिट्टी को पलटता और ढीला करता है। | यांत्रिक औज़ार | |
| बीज ड्रिल (Seed Drill) | बीजों को समान दूरी और गहराई पर मिट्टी में बोने के लिए। | आधुनिक औज़ार | |
| दरांती (Sickle) | फसलों की कटाई के लिए पारंपरिक हाथ से चलने वाला औज़ार। | पारंपरिक औज़ार | |
| लेवलर (Leveller) | जुताई के बाद भूमि को समतल करने के लिए। | पारंपरिक और यांत्रिक दोनों | |
| हार्वेस्टर (Harvester) | फसल की कटाई और मड़ाई दोनों एक साथ करने के लिए आधुनिक मशीन। | यांत्रिक औज़ार |
कृषि औज़ारों का महत्त्व
- फसल उत्पादन की गति और दक्षता बढ़ाते हैं।
- समय और श्रम की बचत होती है।
- मिट्टी की गुणवत्ता और फसल की पैदावार में सुधार होता है।
- खेतों की जुताई, बुआई, सिंचाई और कटाई आसान बनती है।
कृषि औज़ार किसान के लिए उतने ही आवश्यक हैं जितनी मिट्टी और बीज। आधुनिक उपकरणों के प्रयोग से न केवल उत्पादन बढ़ता है बल्कि खेती को वैज्ञानिक और लाभकारी बनाया जा सकता है।
बीजों का चयन एवं बुआई (Selection and Sowing of Seeds)
मिट्टी तैयार होने के बाद अगला चरण होता है बीजों का चयन और बुआई। बीज फसल का मूल आधार होते हैं। अच्छे, स्वस्थ और उच्च गुणवत्ता वाले बीजों से ही अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है। बीज बोने की विधि और गहराई भी फसल की सफलता को प्रभावित करती है।
Fasal utpadan aur parbandhan Class 8 ncert Notes in hindi
किसी भी फसल की सफलता का 70% भाग बीज की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। इसलिए बीज चयन कृषि का अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है।
बीजों का चयन (Selection of Seeds)
अच्छे बीजों के चयन से फसल की गुणवत्ता और मात्रा दोनों बढ़ती हैं। बीजों का चयन करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा जाता है —
- बीज स्वस्थ, परिपक्व और रोग रहित होना चाहिए।
- बीजों का आकार समान और वजन सामान्य होना चाहिए।
- बीजों में नमी बहुत अधिक नहीं होनी चाहिए।
- बीजों की अंकुरण क्षमता (Germination Capacity) अच्छी होनी चाहिए।
बीजों की शुद्धता जांचने की विधि
बीजों को पानी में डालकर उनकी गुणवत्ता जांची जा सकती है।
एक पात्र में पानी भरें और उसमें बीज डालें —
- जो बीज नीचे बैठ जाते हैं, वे स्वस्थ और उपयुक्त हैं।
- जो बीज ऊपर तैरते हैं, वे हल्के और अनुपयोगी हैं।
बुआई (Sowing of Seeds)
बीजों का चयन करने के बाद उन्हें उचित विधि से मिट्टी में बोया जाता है। इसे बुआई कहा जाता है। सही बुआई से पौधों को उचित दूरी, प्रकाश, जल और पोषण मिलता है।
| बुआई की विधि | विवरण | उदाहरण |
|---|---|---|
| हाथ से बुआई | बीज हाथ से समान रूप से खेत में फैलाए जाते हैं। | धान, गेहूँ |
| बीज ड्रिल द्वारा बुआई | ट्रैक्टर या उपकरण की सहायता से बीज समान गहराई और दूरी पर बोए जाते हैं। | मक्का, सोयाबीन |
| रोपाई विधि | पहले पौध तैयार किए जाते हैं और फिर उन्हें खेत में रोपा जाता है। | धान, गन्ना |
सही बुआई के लाभ
- पौधों को उचित दूरी और पोषक तत्व मिलते हैं।
- खरपतवार की वृद्धि नियंत्रित रहती है।
- जल और खाद की बर्बादी नहीं होती।
- फसल की पैदावार अधिक होती है।
स्वस्थ बीजों का चयन और उचित बुआई विधि अपनाना कृषि का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। सही बीज और सही गहराई पर बुआई से फसल स्वस्थ और अधिक उत्पादक होती है।
सीड ड्रिल (Seed Drill)
परिचय : सीड ड्रिल एक आधुनिक कृषि उपकरण है जिसका उपयोग बीजों को मिट्टी में समान दूरी और समान गहराई पर बोने के लिए किया जाता है। इससे बीजों की पंक्तिबद्ध बुआई होती है, अंकुरण बेहतर होता है और बीजों की बर्बादी कम होती है।
सीड ड्रिल का आविष्कार किसानों के श्रम और समय की बचत के लिए हुआ — यह पारंपरिक हाथ से बुआई की तुलना में अधिक सटीक और प्रभावी है।
सीड ड्रिल कैसे काम करती है?
सीड ड्रिल को ट्रैक्टर, बैल या हाथ से खींचा जा सकता है। मशीन मिट्टी में छोटी-छोटी नाली (furrows) बनाती है, हर नाली में बीज छोड़ा जाता है और फिर बीजों को हल्की मिट्टी ढक दी जाती है — जिससे बीज सुरक्षित रहते हैं और अंकुरण के लिए अनुकूल वातावरण मिलता है।
मुख्य भाग
- बीज दानी (Seed Hopper)
- फर्रो (Furrow openers)
- बीज वितरण तंत्र (Seed metering mechanism)
- कवरिंग डिवाइस (Soil covering device)
- गहरी समायोजन सिस्टम (Depth adjustment)
🔹 फायदे
- समान दूरी और गहराई पर बुआई
- बीजों की बर्बादी घटती है
- अंकुरण दर में सुधार
- समय और श्रम की बचत
सीड ड्रिल के प्रकार
| प्रकार | विवरण | उपयोग |
|---|---|---|
| हैंड/मैनुअल सीड ड्रिल | हाथ से या छोटी मशीन द्वारा संचालित। | छोटी खेतों और कंद-तरकारी के लिये उपयुक्त। |
| बैल चालित सीड ड्रिल | बैल या जानवरों से खींची जाने वाली यंत्र। | मध्यम आकार के खेतों में उपयोगी। |
| ट्रैक्टर चालित सीड ड्रिल | ट्रैक्टर से जुड़कर काम करने वाली बड़ी मशीन। | बड़े खेतों और व्यावसायिक खेती के लिए उपयुक्त। |
उपयोग के लिए सुझाव (Best Practices)
- सीड ड्रिल का प्रयोग करने से पहले बीजों को शुद्ध और सुखा लें।
- गहराई और बीज-दर (seed rate) मशीन पर सही सेट करें।
- मशीन के बीज मीटरिंग हिस्से की नियमित जाँच और सफाई करें।
- हर्द-बीजों (large seeds) तथा छोटे बीजों के अनुसार हपर और मीटरिंग सेटिंग बदलें।
- नियमित रूप से तेल-चेक और मशीन की मरम्मत करें ताकि संचालन सटीक रहे।
फसल उत्पादन और प्रबंधन class 8 ncert Notes in Hindi
सीड ड्रिल आधुनिक खेती में एक महत्वपूर्ण उपकरण है — यह बीजों को सुरक्षित, सटीक और आर्थिक तरीके से बुवाई करने में सहायक है, जिससे फसलों की पैदावार और गुणवत्ता दोनों बेहतर होती हैं।
खाद और उर्वरक
फसलों की अच्छी वृद्धि के लिए पौधों को नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P) और पोटैशियम (K) जैसे पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। इन पोषक तत्वों की पूर्ति खाद (Manure) और उर्वरक (Fertilizer) के माध्यम से की जाती है।
खाद और उर्वरक मिलना (Application of Manure and Fertilizers)
मिट्टी में खाद और उर्वरक मिलाना बहुत आवश्यक होता है क्योंकि फसलें पोषक तत्वों का उपयोग करके मिट्टी को पोषक तत्वों से रहित कर देती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए खेतों में जैविक खाद और रासायनिक उर्वरक डाले जाते हैं।
फसल काटने के बाद मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। इसलिए अगली फसल से पहले मिट्टी में खाद या उर्वरक मिलाना आवश्यक होता है ताकि मिट्टी फिर से पोषक तत्वों से भरपूर हो सके।
खाद (Manure)
खाद एक प्राकृतिक पदार्थ है जो पशुओं के मल-मूत्र, सूखी पत्तियों, और पौधों के अवशेषों के सड़ने से बनता है। यह मिट्टी की भौतिक संरचना को सुधारता है और उसमें जैविक पदार्थ (organic matter) बढ़ाता है।
खाद के प्रकार:
- गोबर की खाद (Farmyard Manure)
- कंपोस्ट (Compost)
- हरी खाद (Green Manure)
उर्वरक (Fertilizer)
उर्वरक रासायनिक पदार्थ होते हैं जिनमें पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्व जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम निर्धारित अनुपात में पाए जाते हैं। ये तुरंत मिट्टी में घुलकर पौधों को पोषण देते हैं।
उदाहरण:
- यूरिया (Urea)
- डी.ए.पी. (Diammonium Phosphate)
- एन.पी.के. मिश्रण (NPK Mixture)
खाद और उर्वरक में अंतर (Difference between Manure and Fertilizer)
| क्रमांक | खाद (Manure) | उर्वरक (Fertilizer) |
|---|---|---|
| 1 | प्राकृतिक रूप से प्राप्त जैविक पदार्थ है। | रासायनिक रूप से निर्मित पदार्थ है। |
| 2 | मिट्टी की संरचना और जल धारण क्षमता सुधारता है। | मिट्टी की संरचना पर कोई प्रभाव नहीं डालता। |
| 3 | धीरे-धीरे कार्य करता है। | तुरंत पौधों को पोषण देता है। |
| 4 | मिट्टी के जीवाणुओं के लिए लाभकारी होता है। | अधिक प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता घटा सकता है। |
| 5 | कम पोषक तत्व होते हैं। | अधिक पोषक तत्व निश्चित मात्रा में होते हैं। |
खाद और उर्वरक दोनों ही फसलों के लिए आवश्यक हैं। खाद मिट्टी की गुणवत्ता सुधारती है जबकि उर्वरक पौधों को तुरंत पोषण देता है। संतुलित और उचित मात्रा में दोनों का उपयोग ही स्वस्थ और अधिक उपजाऊ फसल सुनिश्चित करता है।
सिंचाई (Irrigation)
फसल की अच्छी वृद्धि और अधिक उत्पादन के लिए मिट्टी में नमी बनाए रखना बहुत आवश्यक है। जब वर्षा पर्याप्त नहीं होती या अनियमित होती है, तब पौधों को जल की पूर्ति सिंचाई के माध्यम से की जाती है।
सिंचाई वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा खेतों में आवश्यक मात्रा में समय-समय पर पानी पहुँचाया जाता है ताकि फसलें सही ढंग से बढ़ सकें।
सिंचाई का महत्व (Importance of Irrigation)
- फसलों को आवश्यक नमी प्रदान करता है।
- पोषक तत्वों को घोलकर पौधों की जड़ों तक पहुँचने में मदद करता है।
- मिट्टी के तापमान को नियंत्रित रखता है।
- सूखे की स्थिति में फसलों को बचाता है।
- बीजों के अंकुरण और वृद्धि में सहायता करता है।
सिंचाई के स्रोत (Sources of Irrigation)
भारत में सिंचाई के लिए विभिन्न प्राकृतिक और कृत्रिम स्रोतों का उपयोग किया जाता है।
| स्रोत | विवरण |
|---|---|
| 1. कुएँ (Wells) | जल को भूमि के नीचे से प्राप्त किया जाता है। छोटे किसानों द्वारा सामान्यतः उपयोग किया जाता है। |
| 2. ट्यूबवेल (Tube Wells) | डीजल या विद्युत मोटर की सहायता से गहरे भूजल से पानी निकाला जाता है। |
| 3. नहरें (Canals) | बड़ी नदियों से जल को नहरों के माध्यम से खेतों तक पहुँचाया जाता है। |
| 4. तालाब (Ponds) | वर्षा का जल एकत्रित करने का पारंपरिक साधन है। |
| 5. झीलें और जलाशय (Lakes & Reservoirs) | वर्षा के जल को लंबे समय तक संचित रखकर उपयोग में लाया जाता है। |
सिंचाई के पारंपरिक तरीके (Traditional Methods of Irrigation)
प्राचीन समय में किसान हाथ या पशु-शक्ति की सहायता से पानी खेतों तक पहुँचाते थे। ये तरीके सस्ते होते हैं लेकिन इनसे बहुत अधिक श्रम और समय लगता है।
मुख्य पारंपरिक सिंचाई विधियाँ:
- 1. मोत (Mote): इसमें बाल्टी या डिब्बे के माध्यम से कुएँ से पानी निकाला जाता है।
- 2. ढेंकली (Dhekli): यह एक डंडे और रस्सी की सहायता से पानी खींचने का यंत्र है।
- 3. राही या रहट (Rahat): इसमें बैलों की सहायता से चक्के के माध्यम से कुएँ से पानी निकाला जाता है।
- 4. चैन पम्प (Chain Pump): इसमें एक चैन पर बाल्टियाँ लगी होती हैं जो लगातार घूमकर पानी ऊपर लाती हैं।
पारंपरिक सिंचाई के फायदे और नुकसान
| फायदे | नुकसान |
|---|---|
| सस्ता और सरल तरीका है। | समय और श्रम अधिक लगता है। |
| बिजली या मशीन की आवश्यकता नहीं होती। | जल की बर्बादी अधिक होती है। |
| ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से उपयोगी। | बड़े खेतों में प्रभावी नहीं। |
सिंचाई कृषि का एक अनिवार्य भाग है जो फसलों को जल की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करता है। पारंपरिक विधियाँ आज भी कुछ स्थानों पर उपयोग की जाती हैं, परंतु आधुनिक सिंचाई प्रणालियाँ जैसे स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई अब अधिक प्रभावी और जल-संरक्षक साबित हो रही हैं।
सिंचाई की आधुनिक विधियां
कृषि में जल का अत्यधिक या अपर्याप्त उपयोग फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों को प्रभावित करता है। इस समस्या को दूर करने के लिए आधुनिक सिंचाई विधियों का उपयोग किया जाता है, जिससे जल की बचत के साथ समान रूप से खेत में पानी पहुंचाया जा सके।
1. छिड़काव विधि (Sprinkler System)
2. टपक सिंचाई विधि (Drip Irrigation System)
1. छिड़काव विधि (Sprinkler System)
इस विधि में पानी पाइपों के माध्यम से खेत में बिछाए गए नोज़ल (nozzles) से छोटे-छोटे छिद्रों के जरिए फव्वारे की तरह छिड़का जाता है। यह विधि वर्षा की तरह जल प्रदान करती है और सूखी व रेतीली भूमि के लिए उपयुक्त है।
छिड़काव विधि के लाभ :
- जल की बचत होती है।
- असमान भूमि पर भी सिंचाई संभव।
- मिट्टी का कटाव नहीं होता।
- फसल की जड़ों तक समान रूप से जल पहुंचता है।
2. टपक सिंचाई विधि (Drip Irrigation System)
इस विधि में पानी पाइपों और छोटे-छोटे छिद्रों के माध्यम से बूंद-बूंद करके सीधे पौधों की जड़ों तक पहुँचाया जाता है। यह सबसे जल-संरक्षणकारी सिंचाई प्रणाली है, जो विशेष रूप से फल, सब्जियों और फूलों की खेती में उपयोगी होती है।
टपक सिंचाई विधि के लाभ :
- जल की अत्यधिक बचत होती है।
- खरपतवार की वृद्धि कम होती है।
- जल सीधे पौधे की जड़ तक पहुँचता है।
- फसल की उत्पादकता बढ़ती है।
निष्कर्ष :छिड़काव और टपक सिंचाई दोनों ही आधुनिक तकनीकें जल की कमी की समस्या को दूर करने में अत्यंत उपयोगी हैं। इनसे फसलों की गुणवत्ता में सुधार होता है और जल संरक्षण भी सुनिश्चित होता है।
खरपतवार से सुरक्षा (Protection from Weeds)
खरपतवार वे अवांछित पौधे हैं जो फसलों के साथ उग आते हैं और उनसे पोषक तत्व, जल, प्रकाश तथा स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। खरपतवार फसल की वृद्धि और उत्पादन को कम कर देते हैं, इसलिए इनसे सुरक्षा आवश्यक है।
खरपतवार के नुकसान :
- ये फसल के पोषक तत्वों को कम कर देते हैं।
- फसल की वृद्धि और उपज घट जाती है।
- कुछ खरपतवार हानिकारक कीटों और रोगों का आश्रय स्थल बन जाते हैं।
- खरपतवार कटाई में कठिनाई पैदा करते हैं।
खरपतवार नियंत्रण के उपाय :
खरपतवार को नियंत्रित करने के कई पारंपरिक और आधुनिक तरीके अपनाए जाते हैं।
1. हाथ से निराई (Manual Weeding):इस विधि में किसान हाथ या खुरपी जैसे उपकरणों की सहायता से खरपतवार निकालते हैं। यह छोटी भूमि के लिए उपयुक्त है।
2. कृषि उपकरणों से नियंत्रण:खरपतवार को हटाने के लिए निराई यंत्र (Weeder) या कुल्टीवेटर (Cultivator) का उपयोग किया जाता है, जिससे मिट्टी ढीली होती है और खरपतवार निकल जाते हैं।
3. रासायनिक नियंत्रण (Herbicides):खरपतवार नाशक रसायनों का उपयोग किया जाता है जो खरपतवार को नष्ट कर देते हैं। जैसे – 2,4-D, अत्राज़ीन आदि। रसायनों का प्रयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
4. फसल चक्र अपनाना:विभिन्न प्रकार की फसलों को क्रम से उगाने से कुछ विशेष प्रकार के खरपतवारों की वृद्धि को नियंत्रित किया जा सकता है।
निष्कर्ष:खरपतवार नियंत्रण फसल की उत्पादकता और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए आवश्यक है। नियमित निराई, उपयुक्त कृषि उपकरणों और रासायनिक विधियों के संयोजन से खरपतवारों पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।
कटाई (Harvesting)
जब फसल पूरी तरह पक जाती है, तब उसे खेत से काटने की प्रक्रिया को कटाई कहते हैं। फसल पकने पर उसके दाने सख्त, सुनहरे या भूरे रंग के हो जाते हैं। यह कृषि का अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है क्योंकि इसी समय किसान को अपने परिश्रम का परिणाम मिलता है।
कटाई के मुख्य तरीके :
- हाथ से कटाई : दरांती (Sickle) या हंसिया की मदद से फसल काटी जाती है। यह पारंपरिक तरीका है और छोटे खेतों में प्रचलित है।
- यांत्रिक कटाई : बड़े खेतों में आधुनिक मशीनों जैसे हार्वेस्टर (Harvester) या रीपर (Reaper) से फसल काटी जाती है, जिससे समय और श्रम दोनों की बचत होती है।
कटाई के बाद की क्रियाएं
फसल काटने के बाद भी कुछ महत्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं ताकि अन्न को भंडारण योग्य बनाया जा सके।
1. गहाई (Threshing):गहाई में काटी गई फसल से दानों को अलग किया जाता है। यह कार्य पारंपरिक रूप से बैल या थ्रेसर मशीन की सहायता से किया जाता है।
2. मड़ाई (Winnowing):मड़ाई द्वारा दानों को भूसे से अलग किया जाता है। हवा की सहायता से हल्का भूसा उड़ जाता है और भारी दाने नीचे गिरते हैं।
3. सुखाना (Drying):अनाज को सूर्य के प्रकाश में अच्छी तरह सुखाया जाता है ताकि उसमें नमी न रहे। सूखा अनाज लंबे समय तक सुरक्षित रहता है।
निष्कर्ष :कटाई फसल उत्पादन की अंतिम और सबसे संतोषजनक प्रक्रिया है। यदि इसे सावधानी से किया जाए तो अनाज की गुणवत्ता और भंडारण क्षमता दोनों बनी रहती हैं।
भंडारण (Storage of Grains)
फसल की कटाई और सुखाने के बाद अनाज को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया को भंडारण कहते हैं। सही भंडारण से अनाज लंबे समय तक सुरक्षित रहता है और कीटों, फफूंद तथा नमी से बचा रहता है।
भंडारण का उद्देश्य :
- अनाज को सड़ने और कीटों से बचाना।
- अन्न की गुणवत्ता को बनाए रखना।
- बाजार में उचित समय पर बेचने के लिए अनाज को सुरक्षित रखना।
भंडारण के लिए आवश्यक सावधानियां :
- भंडारण से पहले अनाज को अच्छी तरह सुखा लेना चाहिए ताकि उसमें नमी न रहे।
- भंडारण स्थान को साफ़ और सूखा रखना चाहिए।
- भंडार में चूहे, कीट और नमी से सुरक्षा के उपाय करने चाहिए।
- अनाज को बंद टंकियों, धातु या प्लास्टिक ड्रमों में रखना चाहिए।
- बड़े पैमाने पर अनाज रखने के लिए गोदामों या साइलो (Silo) का उपयोग किया जाता है।
भंडारण के आधुनिक साधन :
- साइलो (Silo): बड़ी धातु या कंक्रीट की टंकियां जिनमें बड़ी मात्रा में अनाज सुरक्षित रखा जाता है।
- गोदाम (Warehouse): बड़े पैमाने पर भंडारण के लिए बनाए गए भवन, जिनमें तापमान और नमी का नियंत्रण किया जाता है।
- वायुरोधी पात्र (Airtight Containers): कीट और नमी से सुरक्षा के लिए वायुरोधी डिब्बों का प्रयोग किया जाता है।
निष्कर्ष :सही भंडारण तकनीक अपनाने से किसानों को फसल का नुकसान नहीं होता और खाद्यान्न की गुणवत्ता बनी रहती है। यह खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने का एक आवश्यक कदम है।
जंतुओं से भोजन (Food from Animals)
मनुष्य अपने भोजन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पौधों के साथ-साथ जंतुओं पर भी निर्भर करता है। जंतुओं से हमें दूध, अंडे, माँस, शहद और अन्य अनेक उपयोगी पदार्थ प्राप्त होते हैं। इस प्रकार के भोजन को जंतुओं से प्राप्त भोजन कहा जाता है।
जंतुओं से प्राप्त मुख्य खाद्य पदार्थ :
- दूध (Milk): गाय, भैंस, बकरी, ऊँट आदि जानवरों से प्राप्त होता है। दूध पोषक तत्वों से भरपूर होता है, जिसमें प्रोटीन, कैल्शियम और विटामिन पाए जाते हैं।
- अंडा (Egg): मुर्गी, बतख आदि के अंडे प्रोटीन का अच्छा स्रोत हैं।
- माँस (Meat): बकरी, मुर्गी, मछली, सूअर आदि से प्राप्त होता है। इसमें प्रोटीन, वसा और खनिज पदार्थ पाए जाते हैं।
- शहद (Honey): मधुमक्खियाँ फूलों का रस (मकरंद) इकट्ठा करके शहद बनाती हैं, जो मीठा और औषधीय गुणों से युक्त होता है।
पशुपालन (Animal Husbandry)
पशुओं से अधिक और अच्छी गुणवत्ता का भोजन प्राप्त करने के लिए उन्हें व्यवस्थित रूप से पालने की प्रक्रिया को पशुपालन कहा जाता है। इसमें दूध देने वाले पशु, मुर्गियाँ, बकरियाँ, भेड़ और मछलियाँ शामिल होती हैं।
पशुपालन के लाभ :
- दूध, अंडे और माँस का उत्पादन बढ़ता है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर मिलते हैं।
- खाद के रूप में पशुओं के गोबर का उपयोग किया जाता है।
- कृषि में बैलों का उपयोग खेत जोतने में किया जाता है।
निष्कर्ष :जंतुओं से प्राप्त भोजन हमारे आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह शरीर को ऊर्जा, प्रोटीन और पोषण प्रदान करता है। पशुपालन के माध्यम से हम खाद्य सुरक्षा और आर्थिक विकास दोनों को सुदृढ़ बना सकते हैं।
प्रमुख शब्द (Key Terms)
निम्नलिखित इस अध्याय में प्रयोग किए गए प्रमुख शब्द हैं, जो कृषि से संबंधित महत्वपूर्ण अवधारणाओं को समझने में मदद करते हैं:
| क्रमांक | शब्द | संक्षिप्त अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | कृषि पद्धतियाँ | फसल उगाने की विधियाँ, जैसे – हल जोतना, बुआई, सिंचाई आदि। |
| 2 | पशुपालन | जानवरों को दूध, माँस या अन्य उत्पादों के लिए पालने की प्रक्रिया। |
| 3 | फसल | एक ही प्रकार के पौधों को बड़ी मात्रा में उगाना। |
| 4 | उर्वरक | रासायनिक पदार्थ जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं। |
| 5 | भण्डार गृह | अनाज या फसल के सुरक्षित भंडारण के लिए स्थान। |
| 6 | कटाई | पकी हुई फसल को खेत से काटने की प्रक्रिया। |
| 7 | सिंचाई | फसल को पानी देने की प्रक्रिया। |
| 8 | खरीफ | बरसात के मौसम (जुलाई से अक्टूबर) में उगाई जाने वाली फसलें। |
| 9 | खाद | सड़ने-गलने वाले जैविक पदार्थ जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं। |
| 10 | हल | मिट्टी जोतने का पारंपरिक कृषि औजार। |
| 11 | रबी | सर्दियों के मौसम (अक्टूबर से मार्च) में उगाई जाने वाली फसलें। |
| 12 | बीज | वह भाग जिससे नया पौधा उत्पन्न होता है। |
| 13 | साइलो | बड़े पैमाने पर अनाज भंडारण की धातु या कंक्रीट संरचना। |
| 14 | बुआई | बीजों को मिट्टी में डालने की प्रक्रिया। |
| 15 | भण्डारण | फसल को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया। |
| 16 | थ्रेशिंग | कटाई के बाद फसल से दाने अलग करने की प्रक्रिया। |
| 17 | खरपतवार | फसलों के साथ उगने वाले अवांछित पौधे। |
| 18 | खरपतवारनाशी | रासायनिक पदार्थ जो खरपतवारों को नष्ट करते हैं। |
| 19 | फटकना (विन्नोइंग) | भूसे से दानों को अलग करने की प्रक्रिया। |
आपने क्या सीखा (What You Have Learnt)
इस अध्याय से आपने कृषि और फसल उत्पादन की विभिन्न प्रक्रियाओं के बारे में जाना। नीचे इसके मुख्य बिंदु दिए गए हैं:
- अपनी बढ़ती हुई जनसंख्या को भोजन प्रदान करने के लिए हमें विशिष्ट कृषि पद्धतियों को अपनाना होता है।
- किसी स्थान पर उगाए जाने वाले एक ही प्रकार के पौधों को फसल कहते हैं।
- भारत में फसलों को ऋतु के आधार पर दो वर्गों में बाँटा गया है — रबी और खरीफ फसलें।
- जुताई करके मिट्टी तैयार करना और उसे समतल करना आवश्यक है। इस कार्य के लिए हल तथा पाटल का उपयोग किया जाता है।
- बीजों को उचित गहराई पर बोना तथा उनके बीच उचित दूरी रखना अच्छी उपज के लिए आवश्यक है। बीजों की अच्छी किस्म का चयन करके स्वस्थ बीजों को बोया जाता है। सीड-ड्रिल की सहायता से बुआई की जाती है।
- मिट्टी में पोषक तत्वों की पूर्ति के लिए खाद तथा उर्वरक का उपयोग किया जाता है। फसलों की नई किस्मों के आने से रासायनिक उर्वरकों का उपयोग बढ़ गया है।
- उचित समय एवं अंतराल पर फसल को जल देना सिंचाई कहलाता है।
- निराई में अवांछित पौधों (खरपतवार) को हटाया जाता है।
- कटाई का अर्थ है पकी हुई फसल को हाथों या मशीन से काटना।
- दानों को भूसे से अलग करना थ्रेशिंग कहलाता है।
- बीजों को कीटों और सूक्ष्मजीवों से सुरक्षित रखने के लिए उचित भण्डारण आवश्यक है।
- पशुओं को पालकर भी खाद्य पदार्थ प्राप्त किया जाता है, जिसे पशुपालन कहा जाता है।
अभ्यास — उत्तर (Exercise — Solutions)
1. उपयुक्त शब्द चुनकर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए — (तैयारी, जल, फसल, पोषक, तैरेंगे)
- (क) एक स्थान पर एक ही प्रकार के बड़ी मात्रा में उगाए गए पौधों को फसल कहते हैं।
- (ख) फसल उगाने से पहले प्रथम चरण मिट्टी की तैयारी होती है।
- (ग) क्षारीय बीज जल की सतह पर तैरेंगे।
- (घ) फसल उगाने के लिए पर्याप्त सूर्य का प्रकाश एवं मिट्टी से पोषक तथा जल आवश्यक हैं।
2. ‘कॉलम A’ में दिए शब्दों का मिलान ‘कॉलम B’ से कीजिए —
| कॉलम A | कॉलम B (उत्तर) |
|---|---|
| (i) खरीफ फसल | (e) — धान एवं मक्का |
| (ii) रबी फसल | (d) — गेहूँ, चना, मटर |
| (iii) रासायनिक उर्वरक | (b) — यूरिया एवं सुपर फॉस्फेट |
| (iv) कार्बनिक खाद | (c) — पशु अपशिष्ट, गोबर, मृत एवं पादप अवशेष |
3. निम्न के दो- दो उदाहरण दीजिए —
- खरीफ फसल: धान, मक्का
- रबी फसल: गेहूँ, मटर
4. निम्न पर अपने शब्दों में एक-एक पैराग्राफ लिखिए —
(क) मिट्टी तैयार करना
मिट्टी तैयार करने का अर्थ है खेत की ऊपरी परत को जुताकर भुरभुरा बनाना और समतल करना। जुताई (प्लाऊइंग) से मिट्टी में हवादारता बढ़ती है, पुरानी जड़ें और खरपतवार जमीन से ऊपर आते हैं तथा मिट्टी के पोषक तत्व उपलब्ध होते हैं। जुताई के बाद लेवलिंग (समान करना) आवश्यक है ताकि पानी खेत में समान रूप से फैले और बीज समान गहराई पर बोए जा सकें। मिट्टी की तैयारी में गोबर या कम्पोस्ट जैसी जैविक खाद भी मिलाई जाती है जिससे मिट्टी उपजाऊ बनती है।
(ख) बुआई
बुआई (सॉइंग) वह प्रक्रिया है जिसमें तैयार की हुई जमीन में बीज बोए जाते हैं। बुआई सही मौसम, उपयुक्त बीज, बीज की सही गहराई और पौधों के बीच उचित दूरी पर की जानी चाहिए ताकि पौधों को पर्याप्त पोषण, जल और प्रकाश मिल सके। बुआई हाथ से, सीड ड्रिल से या रोपाई विधि द्वारा की जा सकती है। आधुनिक ड्रिल से बुआई करने पर बीज समान गहराई और दूरी पर लगते हैं जिससे अंकुरण दर और उपज बेहतर होती है।
(ग) निराई
निराई का मतलब खेत से अवांछित पौधे यानी खरपतवारों को हटाना है। खरपतवार फसलों के साथ पोषक तत्व, जल और रोशनी के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं और फसल की पैदावार घटाते हैं। निराई हाथ से, खुरपी/निराई यंत्र से या कुल्टीवेटर के माध्यम से की जा सकती है। समय-समय पर निराई करने से खरपतवार नियंत्रित रहते हैं और फसलों की वृद्धि अच्छी होती है।
(घ) थ्रेशिंग (गहाई)
थ्रेशिंग वह क्रिया है जिसमें काटी हुई फसल से दाने (अन्न) अलग किये जाते हैं। पारंपरिक रूप से इसे बैलों द्वारा या हाथ से किया जाता था; आजकल थ्रेसर मशीनें इसका काम जल्दी और प्रभावी ढंग से कर देती हैं। थ्रेशिंग के बाद दानों को मड़ाई (विन्नोइंग) द्वारा भूसे/छिलकों से अलग किया जाता है और फिर सुखाकर भंडारण के लिए तैयार किया जाता है।
अभ्यास — उत्तर
5. स्पष्ट कीजिए कि उर्वरक खाद से किस प्रकार भिन्न है?
खाद प्राकृतिक रूप से सड़ी-गली जैविक वस्तुओं (पशु मल, गोबर, पत्ते, फसल अवशेष आदि) से बनती है, जो मिट्टी की बनावट सुधारती है और पोषक तत्व धीरे-धीरे प्रदान करती है।
वहीं, उर्वरक रासायनिक रूप से तैयार किए गए पदार्थ होते हैं, जिनमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश आदि तत्व विशिष्ट मात्रा में पाए जाते हैं। ये फसल को तुरंत पोषण देते हैं, लेकिन अधिक मात्रा में उपयोग करने पर मिट्टी की संरचना को हानि पहुंचा सकते हैं।
Fasal utpadan aur parbandhan Class 8 ncert Notes
6. सिंचाई किसे कहते हैं? जल संरक्षण करने वाली सिंचाई की दो विधियों का वर्णन कीजिए।
फसल की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उचित समय पर खेतों में पानी देने की प्रक्रिया को सिंचाई कहते हैं। यह मिट्टी की नमी बनाए रखती है और पौधों की वृद्धि में सहायता करती है।
जल संरक्षण करने वाली आधुनिक सिंचाई की विधियाँ —
- छिड़काव विधि (Sprinkler System): इस विधि में पानी पाइपों और स्प्रिंकलरों की सहायता से वर्षा की तरह फसलों पर डाला जाता है।
- टपक विधि (Drip System): इसमें पतली पाइपों के माध्यम से बूंद-बूंद पानी सीधे पौधों की जड़ों में पहुँचाया जाता है, जिससे जल की काफी बचत होती है।
7. यदि गेहूँ को खरीफ ऋतु में उगाया जाए तो क्या होगा? चर्चा कीजिए।
गेहूँ रबी फसल है और इसे ठंडे मौसम की आवश्यकता होती है। यदि इसे खरीफ ऋतु (गर्म और वर्षा के मौसम) में उगाया जाए तो अधिक तापमान और अत्यधिक वर्षा के कारण फसल ठीक से नहीं उग पाएगी। परिणामस्वरूप बीज अंकुरण, वृद्धि और उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
8. खेत में लगातार फसल उगाने से मिट्टी पर क्या प्रभाव पड़ता है? व्याख्या कीजिए।
लगातार एक ही खेत में फसल उगाने से मिट्टी के पोषक तत्व धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं, जिससे उसकी उर्वरता घट जाती है। इसके अलावा, कुछ विशेष कीट और रोग भी मिट्टी में स्थायी रूप से बढ़ जाते हैं। इसलिए फसल चक्र अपनाना आवश्यक है, जिससे मिट्टी को आराम मिले और पोषक तत्व पुनः संतुलित हों।
Fasal utpadan aur parbandhan Class 8 ncert Notes
9. खरपतवार क्या है? हम उनका नियंत्रण कैसे कर सकते हैं?
खरपतवार वे अवांछित पौधे हैं जो फसलों के साथ उग आते हैं और जल, पोषक तत्व, प्रकाश व स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।
खरपतवार नियंत्रण के उपाय —
- हाथ से या यंत्रों (खुरपी, कुल्टीवेटर) से निराई करना
- खरपतवारनाशी रसायनों (Weedicides) का उपयोग करना
- फसल चक्र अपनाना और खेत की नियमित देखभाल करना
10. निम्न बॉक्स को सही क्रम में इस प्रकार लगाइए कि गन्ने की फसल उगाने का रेखाचित्र तैयार हो जाए।
| क्रम | क्रिया |
|---|---|
| 1 | मिट्टी तैयार करना |
| 2 | खेत की जुताई करना |
| 3 | खाद देना |
| 4 | बुआई |
| 5 | सिंचाई |
| 6 | कटाई |
| 7 | फसल को चीनी मिल में भेजना |
सही क्रम: मिट्टी तैयार करना → खेत की जुताई करना → खाद देना → बुआई → सिंचाई → कटाई → फसल को चीनी मिल में भेजना
प्रश्न 11 — पहेली
नीचे दिए गए संकेतों की सहायता से पहेली को पूरा कीजिए:
ऊपर से नीचे की ओर
- सिंचाई का एक पारंपरिक तरीका — राहट
- बड़े पैमाने पर पालतू पशुओं की उचित देखभाल करना — पशुपालन
- फसल जिन्हें वर्षा ऋतु में बोया जाता है — खरीफ
- फसल पक जाने के बाद काटना — कटाई
बाएँ से दाएँ ओर
- शीत ऋतु में उगाई जाने वाली फसलें — रबी
- एक ही किस्म के पौधों को बड़े पैमाने पर उगाना — फसल
- रासायनिक पदार्थ जो पौधों को पोषक प्रदान करते हैं — उर्वरक
- खरपतवार हटाने की प्रक्रिया — निराई
उत्तर सारांश (Answers Summary):
| संकेत | उत्तर |
|---|---|
| 1. सिंचाई का पारंपरिक तरीका | राहट |
| 2. पालतू पशुओं की देखभाल | पशुपालन |
| 3. वर्षा ऋतु में बोई जाने वाली फसलें | खरीफ |
| 4. फसल काटने की प्रक्रिया | कटाई |
| 5. शीत ऋतु की फसलें | रबी |
| 6. पौधों को बड़े पैमाने पर उगाना | फसल |
| 7. पौधों को पोषक देने वाला रासायनिक पदार्थ | उर्वरक |
| 8. खरपतवार हटाने की प्रक्रिया | निराई |
Fasal utpadan aur parbandhan Class 8 ncert Notes in hindi
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