संसाधन एवं विकास , सतत पोषणीय विकास
अध्याय : संसाधन एवं विकास
संसाधन वे पदार्थ, वस्तुएँ और सुविधाएँ हैं जिनका मनुष्य अपने जीवन की आवश्यकताओं और विकास के लिए उपयोग करता है। पृथ्वी पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन — जैसे भूमि, जल, खनिज, वन, हवा — और मानव निर्मित संसाधन — जैसे उद्योग, तकनीक और मानवशक्ति — मिलकर किसी क्षेत्र की विकास क्षमता तय करते हैं। संसाधनों का वितरण समान नहीं होता; कुछ क्षेत्रों में संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं तो कुछ क्षेत्रों में कमी रहती है।
इस अध्याय में हम सीखेंगे कि संसाधनों का वर्गीकरण कैसे किया जाता है (नैसर्गिक बनाम मानव-निर्मित, नवीनीकरणीय बनाम अनवीनीकरणीय), संसाधनों के प्रबंधन और संरक्षण के सिद्धांत क्या हैं, तथा विकास की प्रक्रिया में संसाधनों की भूमिका और उनके अनुचित उपयोग के परिणाम — जैसे पर्यावरणीय क्षति और असमान विकास — किस प्रकार दिखाई देते हैं। साथ ही, सतत विकास (sustainable development) की अवधारणा और भारत में संसाधन वितरण के कुछ उदाहरणों का अध्ययन भी करेंगे।
Quick tip (परीक्षा हेतु):
संसाधन के उदाहरण और उनका वर्गीकरण याद रखें — अक्सर NCERT प्रश्नों में संसाधन के प्रकार, भारत में वितरण और सतत उपयोग पर छोटे-छोटे उदाहरण पूछे जाते हैं।
इस अध्याय के मुख्य अंश (what you’ll cover):
- संसाधन — परिभाषा और महत्व
- संसाधनों का प्रकार और वर्गीकरण
- संसाधनों का वितरण — क्षेत्रीय असमानताएँ
- संसाधन प्रबंधन, संरक्षण और सतत विकास
- भारत के प्रसंग में संसाधन उपयोग के उदाहरण
संसाधनों का विकास (Development of Resources)
संसाधनों का विकास का अर्थ है — उपलब्ध प्राकृतिक, मानव एवं तकनीकी संसाधनों का ऐसा उपयोग जिससे मानव जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति हो और सामाजिक-आर्थिक प्रगति हो सके।
संसाधनों का विकास केवल उनका दोहन (exploitation) नहीं है, बल्कि उनका संतुलित एवं योजनाबद्ध उपयोग भी आवश्यक है ताकि वर्तमान और भावी पीढ़ियों दोनों को उनका लाभ मिल सके।
मुख्य बिंदु:
- संसाधनों का विकास मानव की आवश्यकताओं एवं तकनीकी प्रगति पर निर्भर करता है।
- अत्यधिक उपयोग (Over Utilization) से संसाधनों की कमी और पर्यावरणीय असंतुलन उत्पन्न होता है।
- संसाधन विकास के लिए योजनाबद्ध नीतियाँ बनाना आवश्यक है — जैसे भूमि सुधार, जल संरक्षण, वनीकरण आदि।
संसाधन विकास का सही अर्थ है — प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए उनका उचित उपयोग, ताकि विकास की प्रक्रिया लंबे समय तक बनी रहे।
संसाधन एवं विकास , सतत पोषणीय विकास
सतत पोषणीय विकास (Sustainable Development)
सतत पोषणीय विकास का अर्थ है — ऐसा विकास जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करे लेकिन आगामी पीढ़ियों की आवश्यकताओं से समझौता न करे।
यह विकास का वह मॉडल है जो आर्थिक प्रगति, सामाजिक समानता और पर्यावरणीय संतुलन — तीनों को साथ लेकर चलता है।
सतत विकास के प्रमुख सिद्धांत:
- संसाधनों का विवेकपूर्ण एवं पुनर्चक्रण योग्य उपयोग
- पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना
- नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (Renewable Resources) को बढ़ावा देना
- जनसंख्या नियंत्रण और शिक्षा का प्रसार
- सामाजिक समानता और गरीबी उन्मूलन
उदाहरण:
वर्षा जल संचयन, सौर ऊर्जा का उपयोग, जैविक खेती, अपशिष्ट पुनर्चक्रण, और वनों का संरक्षण — ये सभी सतत पोषणीय विकास के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1987 में ब्रंटलैंड रिपोर्ट (Brundtland Report) में पहली बार “Sustainable Development” शब्द का प्रयोग किया गया, जिसका लक्ष्य था —
“Our Common Future” यानी हमारी साझा पृथ्वी और उसका संतुलित भविष्य।
Exam Tip:
“सतत विकास” की परिभाषा, इसके तीन स्तंभ (Economic, Social, Environmental) और उदाहरण अवश्य याद रखें — यह प्रश्न अक्सर 3 या 5 अंक में पूछा जाता है।
रियो डी जेनेरियो पृथ्वी सम्मेलन, 1992 (Rio de Janeiro Earth Summit 1992)
वर्ष 1992 में ब्राज़ील के रियो डी जेनेरियो (Rio de Janeiro) शहर में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसे
“पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit)” या “संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एवं विकास सम्मेलन (UN Conference on Environment and Development – UNCED)” कहा गया।
इसका उद्देश्य था — पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन स्थापित करना।
सम्मेलन की मुख्य विशेषताएँ:
- इस सम्मेलन में 170 से अधिक देशों ने भाग लिया।
- मुख्य लक्ष्य था — पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक पर्यावरणीय संसाधनों का संरक्षण।
- सभी देशों ने मिलकर सतत विकास (Sustainable Development) की दिशा में कार्य करने का संकल्प लिया।
- “Agenda 21” नामक एक वैश्विक कार्ययोजना तैयार की गई — जिसका उद्देश्य था पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना।
एजेंडा 21 (Agenda 21)
एजेंडा 21 एक व्यापक कार्ययोजना है जिसे 21वीं सदी में वैश्विक, राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर सतत विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बनाया गया था।
इसमें पर्यावरणीय क्षरण को रोकने, गरीबी घटाने, और संसाधनों के समान वितरण पर बल दिया गया है।
एजेंडा 21 के प्रमुख उद्देश्य:
- प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण एवं पुन: उपयोग।
- पर्यावरणीय शिक्षा और जन-जागरूकता बढ़ाना।
- गरीबी उन्मूलन एवं समानता सुनिश्चित करना।
- स्थानीय स्तर पर “लोकल एजेंडा 21” के माध्यम से सतत विकास को बढ़ावा देना।
महत्व:
रियो सम्मेलन ने वैश्विक स्तर पर पहली बार यह स्पष्ट किया कि पर्यावरणीय संतुलन और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं।
इसी सम्मेलन से “सतत विकास” की अवधारणा विश्व स्तर पर लोकप्रिय हुई और सभी देशों ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में नीतियाँ बनानी शुरू कीं।
Exam Tip:
अक्सर प्रश्न पूछा जाता है — “रियो डी जेनेरियो पृथ्वी सम्मेलन 1992 में कौन से विषय पर चर्चा की गई?”
उत्तर: पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास, और Agenda 21 की स्वीकृति।
संसाधन एवं विकास , सतत पोषणीय विकास
संसाधन नियोजन (Resource Planning)
संसाधन नियोजन का अर्थ है — संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग और योजनाबद्ध प्रबंधन ताकि उनका संतुलित और न्यायपूर्ण वितरण हो सके तथा
वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियाँ दोनों उनका लाभ उठा सकें।
भारत जैसे विशाल देश में, जहाँ प्राकृतिक संसाधन असमान रूप से वितरित हैं, वहाँ संसाधन नियोजन अत्यंत आवश्यक है।
संसाधन नियोजन की आवश्यकता:
- संसाधनों का असमान वितरण (Unequal Distribution) — कुछ क्षेत्रों में अधिक, कुछ में बहुत कम।
- संसाधनों का अत्यधिक दोहन (Overexploitation) — जिससे पर्यावरणीय हानि होती है।
- जनसंख्या वृद्धि और औद्योगिकीकरण के कारण संसाधनों पर दबाव।
- भविष्य के लिए संसाधनों का संरक्षण आवश्यक।
संसाधन नियोजन की प्रमुख अवस्थाएँ (Stages of Resource Planning)
- संसाधनों की पहचान और सूची बनाना:
इसमें प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता, उनकी मात्रा, गुणवत्ता और वितरण का सर्वेक्षण किया जाता है। - संसाधनों के उपयोग की योजना बनाना:
विभिन्न क्षेत्रों की आवश्यकताओं, तकनीकी ज्ञान और उपलब्ध पूंजी को ध्यान में रखकर संसाधनों के उपयोग की रणनीति बनाई जाती है। - योजना का क्रियान्वयन:
शासन, निजी क्षेत्र, और स्थानीय निकायों के सहयोग से संसाधनों के प्रभावी उपयोग हेतु योजनाएँ लागू की जाती हैं।
भारत में संसाधन नियोजन का उदाहरण:
भारत में पंचवर्षीय योजनाएँ (Five Year Plans) संसाधन नियोजन का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
इनमें भूमि सुधार, सिंचाई, ऊर्जा, खनिज, वनीकरण और जल संरक्षण जैसे कार्यक्रमों पर बल दिया गया।
🌱 संसाधन नियोजन और सतत विकास का संबंध
संसाधन नियोजन का मुख्य उद्देश्य यही है कि विकास के साथ-साथ पर्यावरणीय संतुलन भी बना रहे।
यह सुनिश्चित करता है कि हम प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग इस प्रकार करें कि वे भविष्य में भी उपलब्ध रहें।
इसलिए संसाधन नियोजन, सतत पोषणीय विकास का आधार स्तंभ माना जाता है।
मुख्य तथ्य संक्षेप में:
- संसाधन नियोजन = संसाधनों का वैज्ञानिक एवं योजनाबद्ध उपयोग।
- भारत में संसाधन असमान रूप से वितरित हैं।
- तीन चरण – पहचान, योजना, क्रियान्वयन।
- सतत विकास के लिए आवश्यक।
Exam Tip:
“संसाधन नियोजन की अवस्थाएँ” और “संसाधन नियोजन का महत्व” पर प्रश्न अक्सर 3 या 5 अंक में पूछा जाता है।
उदाहरण: “संसाधन नियोजन क्या है? इसके प्रमुख चरण लिखिए।”
भू-संसाधन (Land Resources)
परिचय : पृथ्वी की सतह का ठोस भाग भूमि कहलाता है। भूमि मानव जीवन का आधार है क्योंकि इससे भोजन, आवास, उद्योग, वनस्पति और पशुपालन सभी जुड़े हैं। भूमि एक सीमित और मूल्यवान संसाधन है।
भूमि संसाधनों के प्रकार :
भूमि का वर्गीकरण उसकी उपयोगिता और विशेषताओं के आधार पर किया जाता है —
भूमि संसाधनों का महत्व :
- मानव आवास और कृषि का आधार।
- खनिज, जल, वन, और जैव विविधता का स्रोत।
- औद्योगिक और परिवहन विकास के लिए आवश्यक।
भूमि संसाधनों की समस्याएँ :
- मृदा अपरदन (Soil Erosion)
- वनों की कटाई
- अतिचराई (Overgrazing)
- शहरीकरण और औद्योगीकरण का दबाव
भूमि संरक्षण के उपाय :
- वनों का संरक्षण और वृक्षारोपण।
- समोच्च हल चलाना (Contour Ploughing)।
- टेरेस खेती (Terrace Farming)।
- बंजर भूमि का पुनः उपयोग।
- जैविक खेती को बढ़ावा देना।
निष्कर्ष :
भूमि एक अमूल्य प्राकृतिक संसाधन है। इसका संरक्षण एवं संतुलित उपयोग आने वाली पीढ़ियों के लिए अत्यंत आवश्यक है।
भूमि उपयोग एवं भारत में भूमि उपयोग प्रारूप
परिचय : भूमि का उपयोग विभिन्न मानव गतिविधियों के लिए किया जाता है जैसे — कृषि, वन, आवास, उद्योग और परिवहन। भूमि उपयोग का निर्धारण जलवायु, मृदा, स्थलाकृति, जनसंख्या घनत्व और तकनीकी विकास जैसे कारकों पर निर्भर करता है।
भूमि उपयोग के प्रमुख प्रकार :
- कृषि भूमि (Agricultural Land)
- वनीय भूमि (Forest Land)
- चारागाह भूमि (Pasture Land)
- बंजर भूमि (Barren Land)
- गैर-कृषि उपयोग की भूमि (Land for Non-Agricultural Uses)
भारत में भूमि उपयोग का प्रतिशत (2021 के अनुमान अनुसार)
| भूमि उपयोग का प्रकार | प्रतिशत क्षेत्रफल (%) |
|---|---|
| कृषि योग्य भूमि | ≈ 54% |
| वन क्षेत्र | ≈ 22% |
| चारागाह एवं वृक्षों की भूमि | ≈ 4% |
| बंजर एवं अनुपयोगी भूमि | ≈ 8% |
| गैर-कृषि उपयोग (निर्माण, सड़क, उद्योग आदि) | ≈ 12% |
भारत में भूमि उपयोग की रूपरेखा :
- देश के उत्तर-पश्चिमी भाग (राजस्थान, गुजरात) में बंजर भूमि अधिक पाई जाती है।
- गंगा-ब्रह्मपुत्र समतल क्षेत्र में कृषि भूमि का प्रतिशत सबसे अधिक है।
- पूर्वोत्तर राज्यों और पश्चिमी घाटों में वनीय भूमि अधिक है।
- शहरी क्षेत्रों में गैर-कृषि भूमि का तेजी से विस्तार हो रहा है।
भूमि उपयोग को प्रभावित करने वाले कारक :
- भौतिक कारक — स्थलाकृति, मृदा, जलवायु, वनस्पति।
- आर्थिक कारक — जनसंख्या घनत्व, औद्योगिकीकरण, बाजार की माँग।
- सामाजिक एवं तकनीकी कारक — परंपराएँ, नीति, सिंचाई एवं आधुनिक तकनीक।
निष्कर्ष :
भूमि उपयोग का संतुलन बनाए रखना सतत विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। प्रत्येक क्षेत्र में भूमि की क्षमता के अनुसार ही उसका उपयोग किया जाना चाहिए ताकि भूमि संसाधनों का क्षय न हो।
भूमि निम्नीकरण एवं संरक्षण उपाय (Land Degradation and Conservation Measures)
परिचय : भूमि निम्नीकरण का अर्थ है — भूमि की उत्पादकता में धीरे-धीरे कमी आना। यह प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ मानव गतिविधियों के कारण भी होता है। भूमि का यह ह्रास कृषि, पर्यावरण और आर्थिक संतुलन को प्रभावित करता है।
भूमि निम्नीकरण के प्रमुख कारण :
- वनों की कटाई (Deforestation): वृक्षों की अत्यधिक कटाई से मृदा अपरदन बढ़ता है।
- अतिचराई (Overgrazing): पशुओं द्वारा बार-बार चराई से भूमि बंजर होने लगती है।
- खनन (Mining): भूमि की ऊपरी सतह नष्ट होकर मृदा की उर्वरता घट जाती है।
- शहरीकरण और औद्योगीकरण: कंक्रीट संरचनाओं के कारण भूमि का प्राकृतिक उपयोग घटता है।
- अनियंत्रित सिंचाई: अत्यधिक सिंचाई से लवणीयता (Salinity) और क्षारीयता (Alkalinity) बढ़ती है।
भूमि निम्नीकरण के प्रकार :
- मृदा अपरदन (Soil Erosion)
- लवणीयता और क्षारीयता (Salinization & Alkalization)
- मरुस्थलीकरण (Desertification)
- जलभराव (Waterlogging)
- खनन से भूमि विनाश (Mining Degradation)
भूमि संरक्षण के उपाय :
- वृक्षारोपण (Afforestation): वृक्षों की पुनः रोपाई से मृदा को स्थायित्व मिलता है।
- टेरेस खेती (Terrace Farming): पर्वतीय क्षेत्रों में ढालों पर सीढ़ीनुमा खेत बनाना।
- समोच्च हल चलाना (Contour Ploughing): ढाल के समांतर हल चलाने से जल बहाव कम होता है।
- फसल चक्रीकरण (Crop Rotation): विभिन्न फसलों की बारी-बारी से खेती मृदा की उर्वरता बनाए रखती है।
- वायुरोधी वृक्षारोपण (Wind Breaks): तेज़ हवाओं से मृदा के उड़ने को रोकने के लिए पेड़ों की कतारें लगाई जाती हैं।
- नियंत्रित चराई: पशुओं की संख्या सीमित रखकर भूमि को पुनः उपजाऊ बनाया जा सकता है।
सरकारी पहलें :
- राष्ट्रीय भूमि संसाधन प्रबंधन कार्यक्रम (National Land Resource Management Programme)
- मरुस्थलीकरण रोकथाम कार्यक्रम (Desertification Control Programme)
- राष्ट्रीय कृषि भूमि संरक्षण मिशन (National Mission for Sustainable Agriculture)
निष्कर्ष :
भूमि निम्नीकरण एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या है। इसका समाधान केवल तकनीकी उपायों से नहीं, बल्कि समाज की जागरूकता और जिम्मेदारी से भी संभव है। सतत विकास के लिए भूमि संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
मृदा संसाधन (Soil Resources)
परिचय : मृदा पृथ्वी की ऊपरी सतह की वह पतली परत है जिसमें पौधों की वृद्धि होती है। यह चट्टानों के विघटन तथा जैविक पदार्थों के मिश्रण से बनती है। मृदा मानव जीवन, कृषि एवं पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक प्राकृतिक संसाधन है।
मृदा निर्माण की प्रक्रिया :
मृदा का निर्माण एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है, जिसे अपक्षय (Weathering) कहते हैं। यह भौतिक, रासायनिक और जैविक कारकों से मिलकर होती है।
- भौतिक अपक्षय: तापमान परिवर्तन, जल, हवा आदि के प्रभाव से चट्टानें टूटती हैं।
- रासायनिक अपक्षय: जल और गैसों के रासायनिक प्रभाव से खनिज पदार्थ घुलते हैं।
- जैविक अपक्षय: जीवाणु, कवक और पौधों की जड़ें चट्टानों को तोड़ती हैं।
भारत की प्रमुख मृदा प्रकार :
| मृदा का प्रकार | मुख्य क्षेत्र | विशेषताएँ | मुख्य फसलें |
|---|---|---|---|
| जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil) | गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटी, उत्तर भारत | उर्वर एवं महीन दानेदार | गेहूँ, धान, गन्ना |
| काली मृदा (Black Soil) | दक्कन पठार (महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश) | चिकनी, जल धारण क्षमता अधिक | कपास, सोयाबीन |
| लाल मृदा (Red Soil) | तमिलनाडु, ओडिशा, झारखंड | लोहे के कारण लाल रंग | बाजरा, मूंगफली |
| लेटेराइट मृदा (Laterite Soil) | पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर राज्य | अम्लीय एवं पोषक तत्वों की कमी | चाय, कॉफी |
| मरुस्थलीय मृदा (Desert Soil) | राजस्थान, गुजरात | रेतीली, जल की कमी | बाजरा, ज्वार |
| पर्वतीय मृदा (Mountain Soil) | हिमालयी क्षेत्र | पत्थरदार, ठंडी जलवायु में बनती है | फल, आलू, जौ |
मृदा अपरदन (Soil Erosion):
जब जल या वायु द्वारा मृदा की ऊपरी उर्वर परत बह जाती है, तो उसे मृदा अपरदन कहते हैं।
- पवन अपरदन (Wind Erosion): शुष्क क्षेत्रों में हवा से मृदा उड़ जाती है।
- जल अपरदन (Water Erosion): वर्षा या बाढ़ से मृदा बह जाती है।
मृदा संरक्षण के उपाय :
- वृक्षारोपण और वन संरक्षण।
- समोच्च हल चलाना (Contour Ploughing)।
- टेरेस खेती (Terrace Farming)।
- बाँध एवं जल-संचयन संरचनाएँ बनाना।
- फसल चक्रीकरण और जैविक खाद का प्रयोग।
निष्कर्ष :
मृदा जीवन का आधार है। इसका संरक्षण और उचित प्रबंधन कृषि उत्पादकता, पर्यावरण संतुलन और सतत विकास के लिए आवश्यक है।
काली मृदा (Black Soil)
परिचय : काली मृदा को रेगुर मृदा या कपास मृदा भी कहा जाता है। यह लावा चट्टानों से बनी होती है और इसमें लौह एवं चूना पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।
विशेषताएँ :
- यह चिकनी होती है और जल धारण क्षमता बहुत अधिक होती है।
- गर्मी में दरारें पड़ जाती हैं जिससे वायु का संचार होता है।
- यह अत्यंत उपजाऊ मृदा है।
मुख्य फसलें : कपास, सोयाबीन, गेहूँ, मूंगफली।
लाल एवं पीली मृदा (Red and Yellow Soil)
परिचय : लाल मृदा में लौह ऑक्साइड की अधिकता के कारण लाल रंग होता है। जब यह निचले क्षेत्रों में नमी के संपर्क में आती है तो इसका रंग पीला हो जाता है।
विशेषताएँ :
- यह मृदा अम्लीय और पोषक तत्वों में गरीब होती है।
- सिंचाई और खाद से इसकी उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।
- इसमें जल धारण क्षमता कम होती है।
मुख्य फसलें : बाजरा, मूंगफली, मक्का, दलहन।
मरुस्थलीय मृदा (Desert Soil)
परिचय : यह मृदा शुष्क एवं मरुस्थलीय क्षेत्रों में पाई जाती है। इसमें बालू की मात्रा अधिक होती है और नमी बहुत कम रहती है।
विशेषताएँ :
- यह रेतीली और कम उर्वर होती है।
- क्षारीयता (Alkalinity) अधिक होती है।
- सिंचाई से इसकी उर्वरता बढ़ाई जा सकती है।
मुख्य फसलें : बाजरा, ज्वार, ग्वार, खजूर।
वन मृदा (Forest Soil)
परिचय : वन मृदा घने वन क्षेत्रों में पाई जाती है। यह पत्तियों और जैविक पदार्थों के विघटन से बनती है, इसलिए इसमें ह्यूमस की मात्रा अधिक होती है।
विशेषताएँ :
- इस मृदा का रंग भूरे से गहरे काले तक पाया जाता है।
- नमी की मात्रा अधिक होती है।
- ऊँचाई के अनुसार मृदा की संरचना बदलती रहती है।
मुख्य फसलें : चाय, कॉफी, मसाले, फलों की खेती।
मृदा अपरदन और संरक्षण (Soil Erosion and Conservation)
मृदा अपरदन वह प्रक्रिया है जिसमें मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत हवा, जल या मानव गतिविधियों के कारण हट जाती है।
यह कृषि उत्पादन में कमी, भूमि की उर्वरता घटने और पारिस्थितिकी असंतुलन का कारण बनती है।
मृदा अपरदन के मुख्य कारण:
- वनों की अंधाधुंध कटाई (Deforestation)
- असंतुलित कृषि पद्धतियाँ
- अत्यधिक चराई (Overgrazing)
- खनन और निर्माण कार्य
- तेज हवाएँ और भारी वर्षा
मृदा अपरदन के प्रकार:
- जल अपरदन: वर्षा जल के बहाव से मिट्टी का कटाव।
- पवन अपरदन: तेज हवाओं द्वारा सूखी मिट्टी का उड़ जाना।
- नालानुमा अपरदन (Gully Erosion): वर्षा जल से गहरी नालियाँ बन जाना।
- पतरिया अपरदन (Sheet Erosion): मिट्टी की पतली परत का बह जाना।
मृदा संरक्षण के उपाय:
- वृक्षारोपण और पुनर्वनीकरण
- सीढ़ीनुमा खेती (Terrace Farming)
- समान स्तर पर जुताई (Contour Ploughing)
- पट्टीदार खेती (Strip Cropping)
- घास की पट्टियाँ या झाड़ियाँ लगाना
- जल संचयन और बाँध निर्माण
महत्वपूर्ण तथ्य:
भारत में मृदा अपरदन की समस्या विशेष रूप से मध्य भारत, पश्चिमी घाट और राजस्थान के क्षेत्रों में अधिक देखी जाती है।
सतत भूमि उपयोग और वैज्ञानिक कृषि तकनीकों से इस समस्या को कम किया जा सकता है।
मृदा संरक्षण केवल कृषि के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए आवश्यक है क्योंकि उपजाऊ मिट्टी ही पृथ्वी पर जीवन का आधार है।
अभ्यास — उत्तर (भूमि एवं मृदा)
1. बहुवैकल्पिक प्रश्न — उत्तर
- (i) पंजाब में भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण: अधिक सिंचाई (ख) — (अति सिंचाई से जल-स्तर बढ़ना, जलजमाव व लवणता बढ़ने पर मृदा की उर्वरता घटती है।)
- (ii) किस प्रांत में सीढ़ीनुमा (सीढ़ीदार) खेती की जाती है: उत्तराखण्ड (घ) — (पहाड़ी ढलानों पर सीढ़ीनुमा खेत बनाकर मृदा अपरदन रोका जाता है।)
- (iii) किस राज्य में काली मिट्टी मुख्य रूप से पाई जाती है: महाराष्ट्र (ग)
2. (लगभग 30 शब्दों में उत्तर)
(i) तीन राज्य जहाँ काली मिट्टी मिलती है और मुख्य फसल:
महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात में काली (रेगुर) मिट्टी विस्तृत है। इस मिट्टी पर मुख्य रूप से कपास की खेती की जाती है।
(ii) पूर्वी तट के नदी डेल्टाओं पर किस प्रकार की मिट्टी और उसकी तीन विशेषताएँ:
पूर्वी तट के नदियों के डेल्टा पर जलोढ़ (alluvial) मिट्टी मिलती है। प्रमुख विशेषताएँ: (1) अत्यंत उर्वर, (2) महीन-दानेदार और आसानी से जुतने योग्य, (3) नदियों द्वारा लाये गए पोषक तत्वों से समृद्ध और सिंचाई के लिये उपयुक्त।
(iii) पहाड़ी क्षेत्रों में मृदा अपरदन रोकने के उपाय (संक्षेप):
टेरेस खेती, समोच्च हल चलाना (contour ploughing), वृक्षारोपण, चेक डैम/बाँध बनाना और नियंत्रित चराई जैसी विधियाँ लागू करनी चाहिए।
3. (लगभग 120 शब्दों में उत्तर)
(i) भारत में भूमि उपयोग प्रारूप का वर्णन और 1960–61 से वन क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण वृद्धि न होने का कारण:
भारत की भूमि उपयोग रूपरेखा में कृषि भूमि, वनीकरण, चारागाह, बंजर भूमि तथा गैर-कृषि उपयोग (शहरीकरण, सड़क, उद्योग) शामिल हैं। कृषि भूमि का बड़ा हिस्सा सिंचित एवं गैर-सिंचित क्षेत्रों में बँटा है। 1960–61 के बाद भी वनों के अंतर्गत क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण वृद्धि न होना इसके कई कारणों से है — जनसंख्या वृद्धि के कारण कृषि व आवास के लिए भूमि की माँग बढ़ी; औद्योगिकीकरण और शहरीकरण ने वनों को काटकर भूमि दी; अवैज्ञानिक वनों की कटाई व चराई से वनक्षेत्र घटा; जबकि पुनर्वनीकरण के कई प्रयास हुए, वे वनों के वास्तविक विस्तार को पर्याप्त रूप से बढ़ा नहीं पाए। इसलिए कुल वनक्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं दिखी।
(ii) प्रौद्योगिक और आर्थिक विकास के कारण संसाधनों का अधिक उपभोग कैसे हुआ है (लगभग 120 शब्द):
प्रौद्योगिक और आर्थिक विकास ने जीवन स्तर और मांग दोनों को बढ़ा दिया है। औद्योगीकरण के कारण ऐतिहासिक रूप से ऊर्जा, खनिज, जल और भूमि का व्यापक दोहन हुआ—नयी फैक्टरियाँ, मार्ग, बिजली और भारी मशीनरी के लिए कच्चा माल और ऊर्जा चाहिए। कृषि में आधुनिक यंत्रों, रासायनिक उर्वरकों तथा सतत सिंचाई से उत्पादन बढ़ा परन्तु मृदा और जल संसाधनों पर दबाव भी बढ़ा। आर्थिक विकास के साथ उपभोक्ता वस्तुओं और परिवहन की मांग बढ़ी, जिससे ईंधन और खनिजों का प्रयोग बढ़ा। शहरीकृत जीवन व अधिक उत्पादन की चाह से प्राकृतिक संसाधनों का अति-उपयोग और प्रदूषण भी बढ़ा, जिससे संसाधन कम होकर उनके नवीनीकरण और संरक्षण पर असर पड़ा।
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